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घटती नकदी, बदलता रुझान: क्या लिक्विडिटी संकट की आहट?

क्रेडिट बूम या जोखिम का जाल—तेजी से बढ़ते लोन पर उठे सवाल

बढ़ते डिपॉजिट के पीछे छिपा दबाव? बैंकिंग सिस्टम में संतुलन बिगड़ने के संकेत

निश्चय टाइम्स न्यूज नेटवर्क
भारत के बैंकिंग सिस्टम के ताजा आंकड़े एक जटिल और चिंताजनक तस्वीर सामने ला रहे हैं। एक ओर जहां बैंकों में जमा (डिपॉजिट) लगातार बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर नकदी भंडार और आरबीआई के पास रखी गई राशि में गिरावट वित्तीय संतुलन पर सवाल खड़े कर रही है।

15 मार्च 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, गैर-बैंक डिपॉजिट 25 लाख करोड़ रुपये से ऊपर बने हुए हैं, जो बैंकिंग सिस्टम की मजबूती का संकेत देते हैं। लेकिन इसके समानांतर बैंक क्रेडिट भी तेजी से बढ़कर 20 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है। यह असंतुलन भविष्य में जोखिम पैदा कर सकता है, खासकर तब जब कर्ज की गुणवत्ता पर दबाव बढ़े।

सबसे अहम संकेत नकदी (कैश) में गिरावट से मिल रहा है, जो फरवरी की तुलना में और कम हुआ है। साथ ही, आरबीआई के साथ बैंकों का बैलेंस भी घटा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि तरलता (लिक्विडिटी) पर दबाव बढ़ रहा है। हालांकि आरबीआई से उधारी में कमी आई है, लेकिन इसे पूरी तरह सकारात्मक नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह बैंकों की सीमित नकदी स्थिति को भी दर्शा सकता है।

फूड क्रेडिट के आंकड़ों में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है, जो कृषि और सार्वजनिक वितरण प्रणाली से जुड़े वित्तपोषण में अस्थिरता का संकेत देता है। इसके अलावा “अन्य देनदारियों” में तेज वृद्धि पारदर्शिता और जोखिम प्रबंधन को लेकर नई चिंताएं पैदा कर रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि डिपॉजिट और लोन के बीच संतुलन नहीं बना, तो बैंकिंग सिस्टम पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। ऐसे में नियामक संस्थाओं को सतर्क रहते हुए समय पर हस्तक्षेप करना होगा।

कुल मिलाकर, आंकड़े फिलहाल स्थिरता का भ्रम जरूर पैदा करते हैं, लेकिन भीतर छिपे संकेत भविष्य में संभावित वित्तीय दबाव की चेतावनी दे रहे हैं।

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