राष्ट्रीय

बंदरगाह आधुनिकीकरण या निजीकरण का रास्ता? सरकार के फैसले पर उठे सवाल

438 करोड़ की परियोजना, लेकिन सवाल बरकरार—क्या PPP मॉडल फिर बनेगा बोझ?

50 साल पुरानी संरचना बदलेगी, लेकिन क्या पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ेगी?

निश्चय टाइम्स न्यूज नेटवर्क:
केंद्र सरकार ने New Mangalore Port पर बर्थ संख्या 9 के पुनर्विकास को मंजूरी देकर इसे “परिवर्तनकारी परियोजना” बताया है, लेकिन इस फैसले ने कई अहम सवाल भी खड़े कर दिए हैं। करीब 438 करोड़ रुपये की इस परियोजना को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर लागू किया जाएगा, जिसे लेकर पहले भी पारदर्शिता और जवाबदेही पर बहस होती रही है।

केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने इसे भारत के समुद्री ढांचे को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम बताया है। योजना के तहत पुराने बर्थ को हटाकर अत्याधुनिक सुविधा विकसित की जाएगी, जिससे कच्चे तेल, एलपीजी और पेट्रोलियम उत्पादों की हैंडलिंग क्षमता बढ़ाई जा सकेगी।

हालांकि, आलोचकों का कहना है कि PPP मॉडल में अक्सर निजी कंपनियों को ज्यादा लाभ मिलता है, जबकि जोखिम और लागत का बोझ सार्वजनिक क्षेत्र पर आ जाता है। परियोजना की 30 वर्ष की रियायत अवधि और न्यूनतम गारंटीकृत कार्गो (MGC) की शर्तें भी भविष्य में विवाद का कारण बन सकती हैं।

तकनीकी दृष्टि से यह परियोजना बंदरगाह की क्षमता को 10.90 मिलियन टन प्रति वर्ष तक बढ़ाएगी और बड़े जहाजों, खासकर VLGC (Very Large Gas Carrier) को संभालने में सक्षम बनाएगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या इतनी बड़ी क्षमता का पूरा उपयोग हो पाएगा या यह निवेश अपेक्षित रिटर्न देने में संघर्ष करेगा?

इसके अलावा, बंदरगाहों के आधुनिकीकरण के साथ पर्यावरणीय जोखिम भी जुड़ते हैं, खासकर जब बात खतरनाक तरल पदार्थों जैसे पेट्रोलियम और गैस की हो। सरकार ने आधुनिक सुरक्षा प्रणालियों का दावा किया है, लेकिन पिछले अनुभवों को देखते हुए निगरानी और अनुपालन पर कड़ी नजर रखना जरूरी होगा।

कुल मिलाकर, यह परियोजना जहां एक ओर भारत की समुद्री क्षमता को बढ़ाने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर PPP मॉडल, लागत-लाभ संतुलन और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर कई अनुत्तरित सवाल छोड़ती है।

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