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यूपी के मंत्रियों के ‘पत्र बम’ से मुश्किलों में घिरी योगी सरकार

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक बार फिर अपनी सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों के बीच टकराव की बढ़ती समस्या से जूझ रहे हैं। उनके राजनीतिक विरोधियों का कहना है कि यह समस्या सीएम और उनके मंत्रियों के बीच भरोसे की कमी को दर्शाती है। वहीं, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कई सूत्र इसे मुख्यमंत्री कार्यालय में सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ असंतोष के रूप में देखते हैं।

योगी के दूसरे कार्यकाल के बीते दो वर्षों में आधा दर्जन मंत्रियों ने सरकारी अधिकारियों को निशाने पर लिया है। ताजा मामला महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री प्रतिभा शुक्ला का है, जिन्होंने अपने विभाग में कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को लेकर एक पत्र एकीकृत बाल विकास योजना (ICDS) के निदेशक को लिखा है। शुक्ला ने खुले तौर पर एक जिला कार्यक्रम अधिकारी और उनके कार्यालय के कर्मचारियों पर आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की भर्ती में अनियमितताओं का आरोप लगाया है। हाल ही में जिलों के दौरे के बाद उन्होंने लिखा कि जहां भी वह जाती हैं, वहां भर्ती प्रक्रिया में भ्रष्टाचार की शिकायतें मिल रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि आवेदन लेने से लेकर शॉर्टलिस्ट करने तक का सारा काम डीपीओ की देखरेख में हो रहा है। प्रतिभा शुक्ला योगी आदित्यनाथ के दूसरे कार्यकाल में अपनी ही सरकार के अधिकारियों पर सवाल उठाने वाली सातवीं मंत्री हैं।

उनसे पहले, उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक, कैबिनेट मंत्री आशीष पटेल और संजय निषाद, स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री दिनेश प्रताप सिंह, और राज्य मंत्री दिनेश खटीक अलग-अलग मौकों पर अधिकारियों को लेकर सवाल उठा चुके हैं।

कुछ हफ्ते पहले ही आशीष पटेल ने यूपी के सूचना निदेशक शिशिर सिंह और मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार मृत्यंजय कुमार सिंह पर उनके खिलाफ झूठी खबरें फैलाने का आरोप लगाया था। उन्होंने यूपी पुलिस के विशेष कार्यबल (STF) के प्रमुख अमिताभ यश को चुनौती देते हुए कहा था, अगर हिम्मत है तो सीने पर गोली मारो। आशीष पटेल से पहले उनकी पत्नी और केंद्रीय राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर सरकारी भर्तियों में आरक्षण प्रक्रिया का पालन न किए जाने का आरोप लगाया था।

उत्तर प्रदेश के राजनीतिक विश्लेषक कवी राज के अनुसार, इस सरकार में अधिकारियों और मंत्रियों के बीच टकराव की समस्या आम होती जा रही है। उन्होंने कहा, “बीजेपी को अगले विधानसभा चुनाव से पहले इन मुद्दों को सुलझाना चाहिए। 2024 के लोकसभा चुनावों में, हमने विभिन्न जिलों में आंतरिक कलह की कई कहानियां सुनीं, जिसने भाजपा को कई सीटों पर नुकसान पहुंचाया. अब, उन्हें इन मुद्दों के बड़ा बनने से पहले अपनी स्थिति सुधारनी होगी। मंत्रियों द्वारा अपनी ही सरकार, यहां तक कि अपने मंत्रालयों और विभागों के खिलाफ मोर्चा खोलने से विपक्ष को बैठे-बिठाए मौका मिल गया है। समाजवादी पार्टी की प्रवक्ता पूजा शुक्ला ने कहा, “इस सरकार को अपने मंत्रियों और विधायकों की कोई परवाह नहीं है। हर दूसरे दिन कोई न कोई मंत्री या विधायक सरकारी अधिकारियों से नाराज नजर आता है। वे खुद ही अपने पत्र मीडिया में लीक कर देते हैं। इससे साफ होता है कि उन्हें अपने मुख्यमंत्री पर भरोसा नहीं है।”

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने आरोप लगाया कि इस सरकार में भ्रष्टाचार चरम पर है। उन्होंने कहा, अधिकारियों की सुनवाई नहीं हो रही, मुख्यमंत्री मंत्रियों की नहीं सुन रहे। यह दिखाता है कि इस सरकार में विश्वास की कमी है. अब जनता भी 2027 के विधानसभा चुनाव में उन पर भरोसा नहीं करेगी।

एक कैबिनेट मंत्री ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हम मजबूरी में पत्र लीक करते हैं। सरकारी अधिकारी हमारी बात नहीं सुनते, न सिर्फ तबादलों के मामले में, बल्कि टेंडरिंग और बड़े प्रोजेक्ट्स को फाइनल करने के मामलों में भी। वे धड़ल्ले से पैसे कमा रहे हैं और मुख्यमंत्री कार्यालय उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करता, बल्कि उनकी सुरक्षा करता है। इससे हमें कभी-कभी बहुत बेबस महसूस होता है। यह सब जुलाई 2022 में तब शुरू हुआ जब ब्रजेश पाठक ने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव (ACS) अमित मोहन प्रसाद को पत्र लिखकर डॉक्टरों के तबादलों पर असंतोष व्यक्त किया। ये तबादले तब हुए जब उपमुख्यमंत्री राज्य में मौजूद नहीं थे। अगर डिप्टी सीएम के पास भी शक्ति नहीं है, तो हम कौन होते हैं? सरकार अधिकारी चला रहे हैं। एक अन्य मंत्री ने कहा, समस्या यह है कि सरकार में सीएमओ (मुख्यमंत्री कार्यालय) ही हाई कमांड है। सभी तबादले, नियुक्तियां और टेंडरिंग वहीं से तय होती हैं। मंत्रियों की इसमें कोई खास भूमिका नहीं होती। इस वक्त कोई भी मंत्री यह नहीं कह सकता कि उसे सीधे सीएमओ तक पहुंच हासिल है। छोटे-छोटे कामों के लिए भी हमें सीएमओ से मंजूरी लेनी पड़ती है। यह हर किसी की हताशा को बढ़ाता है और कभी-कभी यही एक ‘वायरल पत्र’ का कारण बन जाता है।

निषाद पार्टी के संस्थापक और भाजपा के सहयोगी संजय निषाद, जिन्होंने पहले भी कई बार राज्य के अधिकारियों पर सवाल उठाए थे, ने कहा, “अधिकारियों को मंत्रियों की बात सुननी चाहिए। वे हमारे प्रति जवाबदेह हैं और हम जनता के प्रति जवाबदेह हैं। उन्होंने यह भी इशारा किया कि राज्य कैबिनेट में कुछ मंत्री राजनीतिक रूप से समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की ओर झुके हुए हैं, लेकिन दिखावे में भाजपा का समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा, वे शीर्ष नेतृत्व को गलत फीडबैक देते हैं।

जुलाई 2022 में, मंत्री दिनेश खटीक ने यहां तक कि इस्तीफा देने की पेशकश कर दी थी, यह कहते हुए कि विभागीय अधिकारी उन्हें नजरअंदाज कर रहे हैं। बताया जाता है कि वह अपने विभाग में तबादलों और अपनी विधानसभा में उनके समर्थकों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को लेकर नाराज थे। बाद में, भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने मुख्यमंत्री और खटीक से बातचीत कर इस मामले को सुलझाया।

उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा, “यह हमारा आंतरिक मामला है, जिसे हम सुलझा लेंगे। विपक्ष को इसे बड़ा मुद्दा बनाने की जरूरत नहीं है। हम हर जगह जीत रहे हैं, इसका मतलब है कि जनता हम पर भरोसा कर रही है। इस तरह की छोटी-मोटी समस्याएं आती-जाती रहती हैं, यह कोई बड़ी बात नहीं है। मंत्रियों की पूरी सुनवाई होती है और सरकार निश्चित रूप से ऐसे किसी भी पत्र का संज्ञान लेती है। एक वरिष्ठ भाजपा पदाधिकारी ने बताया, “आखिरकार, मंत्री और विधायक जनता और अपने कोर कार्यकर्ताओं के प्रति जवाबदेह होते हैं। अगर उन्हें कार्यकर्ताओं से शिकायतें मिलती हैं, तो वे निश्चित रूप से मुख्यमंत्री और शीर्ष अधिकारियों के सामने उन्हें उठाएंगे। लेकिन उन्हें अपने पत्रों को सोशल मीडिया पर लीक करने से बचना चाहिए। इससे पार्टी की छवि को भी नुकसान पहुंचता है।

प्रतीभा शुक्ला के करीबी सूत्रों के अनुसार, उन्होंने पहले ही शीर्ष अधिकारियों को शिकायतों के समाधान के लिए चेतावनी दी थी, लेकिन जब उनकी बात नहीं सुनी गई, तो उनका पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। अपने पत्र में मंत्री ने लिखा कि भर्ती प्रक्रिया में गोपनीयता तक का पालन नहीं किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि डीपीओ कार्यालय के क्लर्क सीधे उम्मीदवारों से संपर्क कर रहे हैं और उनसे पैसे की मांग कर रहे हैं। मंत्री ने मौजूदा भर्ती प्रक्रिया को रद्द करने की मांग की और जिला स्तर के बजाय राज्य स्तर पर भर्ती कराने की सिफारिश की। उन्होंने यह पत्र मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) को भी भेजा है। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने यह पत्र लिखा था और अब न्याय की प्रतीक्षा कर रही हैं। उन्होंने कहा कि जांच जारी है और वह अपनी शिकायत पर कार्रवाई का इंतजार कर रही हैं।

कानपुर से आने वाली प्रतीभा शुक्ला पिछले साल तब सुर्खियों में आई थीं जब उन्होंने स्थानीय पुलिसकर्मियों द्वारा भाजपा कार्यकर्ता पर हमले को लेकर उनकी छह लगातार कॉल न उठाने पर अपने पति के साथ थाने पहुंचकर कार्रवाई की मांग की थी।

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