बिहार

बिहार विधानसभा चुनाव 2025: छठ की खुशी के साथ लौटने लगी वोट न डाल पाने की कसक

बिहार में छठ पूजा का पर्व आस्था, परंपरा और परिवार का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। हर साल लाखों प्रवासी बिहारी मजदूर और कामकाजी लोग अपने घर लौटते हैं ताकि सूर्य देव को अर्घ्य देकर अपनी मिट्टी से जुड़ाव महसूस कर सकें। लेकिन इस साल की छठ पूजा के साथ एक अलग तरह की कसक जुड़ गई है — बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तारीखों के चलते बहुत से लोग बिना वोट डाले ही वापस अपने काम पर लौट जाएंगे।

इस साल छठ पूजा की शुरुआत 25 अक्टूबर को “नहाय खाय” से होगी, जबकि 26 अक्टूबर को “खरना”, 27 अक्टूबर को “संध्या अर्घ्य” और 28 अक्टूबर को “उषा अर्घ्य” अर्पित किया जाएगा। इन दिनों बिहार के घाटों पर अद्भुत नजारा देखने को मिलता है — महिलाएं रंग-बिरंगी साड़ियों में, पुरुष पारंपरिक वस्त्रों में, फल और ठेकुआ से भरे टोकरे लेकर सूर्य देव की पूजा करते हैं। यह दृश्य न सिर्फ धार्मिक भावना बल्कि बिहार की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक बन जाता है।

लेकिन इस बार आस्था के इस उत्सव के साथ चुनाव की गहमागहमी भी है। बिहार विधानसभा चुनाव के लिए मतदान 6 और 11 नवंबर को होना तय है — यानी छठ पूजा खत्म होने के एक हफ्ते और दो हफ्ते बाद। ऐसे में मुंबई, दिल्ली, सूरत, पुणे या दुबई जैसे शहरों में काम करने वाले लाखों बिहारी प्रवासी लोग छठ मनाने तो घर आएंगे, परंतु अधिकतर अपने काम पर लौट जाएंगे और वोट नहीं डाल पाएंगे।

प्रवासी मजदूरों के लिए मतदान सिर्फ एक नागरिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अपनी पहचान और लोकतांत्रिक अधिकार का प्रतीक है। लेकिन कठिन कामकाजी परिस्थितियाँ और छुट्टी न मिल पाने की मजबूरी अक्सर उन्हें अपने इस अधिकार से वंचित कर देती है। इस बार यह विडंबना और गहरी है — क्योंकि छठ जैसी पवित्र परंपरा और चुनाव जैसे लोकतांत्रिक पर्व के बीच फँसा प्रवासी समुदाय एक कठिन चयन के सामने है।

विपक्षी दलों का कहना है कि चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) में कई असली मतदाताओं — खासकर मजदूर वर्ग, दलित, अल्पसंख्यक और पिछड़े समुदायों — के नाम काट दिए हैं। इसी मुद्दे पर राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने ‘वोटर अधिकार यात्रा’ निकाली थी, जिसमें यह दावा किया गया कि लाखों प्रवासी मजदूरों के नाम मतदाता सूची से गायब हैं।

अब जब यही प्रवासी लोग छठ पर घर लौट रहे हैं, तो उनके मन में दो विरोधाभासी भाव हैं — एक तरफ अपने परिवार से मिलने की खुशी, और दूसरी तरफ लोकतंत्र से कट जाने का दर्द। ट्रेन और बसों में सफर करते इन चेहरों पर आस्था की चमक है, पर मन के किसी कोने में अधूरापन भी — जैसे अपने सबसे प्रिय त्योहार में शामिल होकर भी कुछ खो देने का अहसास।

यह स्थिति एक गहरा सवाल उठाती है — क्या थोड़ी अधिक संवेदनशीलता और बेहतर योजना से प्रवासी मतदाताओं को मतदान का अवसर नहीं दिया जा सकता था?

छठ का यह पर्व केवल सूर्य उपासना का उत्सव नहीं, बल्कि उस अटूट रिश्ते का प्रतीक है जो हर बिहारी को अपनी मिट्टी से जोड़ता है। जब घाटों पर सूर्य की किरणें फैलेंगी, तो वे न सिर्फ भक्तों के चेहरों को रोशन करेंगी, बल्कि उस मौन संघर्ष पर भी प्रकाश डालेंगी — उन लाखों बिहारी प्रवासियों के संघर्ष पर जो आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाए रखते हुए, अपने घर और लोकतंत्र दोनों से जुड़े रहने की कोशिश करते हैं।

इस बार छठ की खुशियों में मिट्टी की महक तो होगी, लेकिन दिल में एक अधूरी ख्वाहिश भी — अपने राज्य के भविष्य को अपने वोट से तय न कर पाने की कसक।

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