PM मोदी का संदेश: “सदन में शोर नहीं, सार्थक बहस हो”

निश्चय टाइम्स, डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत से पहले संसद भवन परिसर में मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि संसद को चुनावी हार-जीत की निराशा या अहंकार का मंच नहीं बनना चाहिए। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि वे जनता की आकांक्षाओं और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का सम्मान करते हुए सदन की कार्यवाही में सकारात्मक और सक्रिय रूप से हिस्सा लें। प्रधानमंत्री ने उम्मीद जताई कि यह शीतकालीन सत्र शांतिपूर्ण, सार्थक और देश की प्रगति पर केंद्रित रहेगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्र तेज गति से आगे बढ़ रहा है और यह सत्र उस प्रगति में नई ऊर्जा का संचार करेगा। उन्होंने याद दिलाया कि चुनावों में जीत-हार लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन संसदीय व्यवस्था को मजबूत बनाए रखना सभी निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है। मोदी ने कहा कि निजी राजनीतिक एजेंडे के कारण संसद की कार्यवाही बाधित नहीं होनी चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से नए सांसदों का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें अपने विचार रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए और किसी भी तरह से उनके अभिव्यक्ति के अधिकार को बाधित नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने राजनीतिक दलों से आग्रह किया—“अपनी निराशा या पराजय में नए सांसदों को बलि का पात्र न बनने दें।”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ये शीतकालीन सत्र, ये सिर्फ कोई रिचुअल नहीं है। ये राष्ट्र को प्रगति की ओर तेज गति से ले जाने के जो प्रयास चल रहे हैं, उसमें ऊर्जा भरने का काम, ये शीतकालीन सत्र भी करेगा, ऐसा मेरा पूरा विश्वास है। भारत ने लोकतंत्र को जिया है, लोकतंत्र के उमंग और उत्साह को समय-समय पर ऐसे प्रकट किया है कि लोकतंत्र के प्रति विश्वास और मजबूत होता रहता है। गत दिनों, बिहार में जो चुनाव हुए, उसमें भी मतदान के जो विक्रम हुआ है, वो लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। माताओं-बहनों की जो भागीदारी बढ़ रही है, ये अपने आप में एक नई आशा, नया विश्वास पैदा करती है। एक तरफ लोकतंत्र की मजबूती और इस लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के भीतर अर्थतंत्र की मजबूती, इसको भी दुनिया बहुत बारीकी से देख रही है। भारत ने सिद्ध कर दिया है- Democracy Can Deliver. जिस गति से आज भारत की आर्थिक स्थिति, नई ऊंचाइयों को प्राप्त कर रही है। विकसित भारत के लक्ष्य की ओर जाने में ये हमें नया विश्वास तो जगाती है, नई ताकत भी देती है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि ये सत्र, संसद देश के लिए क्या सोच रही है, संसद देश के लिए क्या करना चाहती है, संसद देश के लिए क्या करने वाली है, इन मुद्दों पर केंद्रित होनी चाहिए। विपक्ष भी अपना दायित्व निभाएं, चर्चा में ऐसे मुद्दा उठाएं, मजबूत मुद्दे उठाएं। पराजय के निराशा में से बाहर निकल करके आए। और दुर्भाग्य ये है कि एकआध-दो दल तो ऐसे हैं कि वे पराजय भी नहीं पचा पाते। और मैं सोच रहा था बिहार के नतीजे इतना समय हो गया है, तो अब थोड़ा संभल गए होंगे, लेकिन कल जो मैं बयानबाजी सुन रहा हूं उनकी, तो उससे लगता है कि पराजय ने उनको परेशान करके रखा है। लेकिन, मेरा सभी दलों से आग्रह है कि शीतकालीन सत्र में पराजय की बौखलाहट का ये मैदान नहीं बनना चाहिए। और ये शीतकालीन सत्र विजय के अहंकार में भी परिवर्तित नहीं होना चाहिए। बहुत ही संतुलित तरीके से, जिम्मेवारी के साथ, जनप्रतिनिधि के रूप में देश की जनता का हमसे जो, हमें दायित्व दिया है और हमसे जो अपेक्षाएं हैं, उसको संभालते हुए, हम आगे के लिए सोचे। जो है उसको कैसे अच्छा कर सके, अगर बुरा होता है तो उसमें सटीक टिप्पणी कैसे कर सके, ताकि देश के नागरिकों का भी ज्ञानवर्धन हो। ये मेहनत का काम जरूर है, लेकिन देश के लिए करना चाहिए। और मैं आशा करता हूं, मेरी एक सबसे बड़ी चिंता रही है पिछले कई लंबे समय से, सदन में जो पहली बार चुनकर के आए हैं या जो छोटी आयु के हैं, वैसे सभी दलों के, सभी सांसद बहुत परेशान है, बहुत दुखी है। उन्हें अपने सामर्थ्य का परिचय कराने का अवसर नहीं मिल रहा है, अपने क्षेत्र की समस्याओं की बात बताने का अवसर नहीं दिया जा रहा है। राष्ट्र के विकास की यात्रा में भागीदार बनने के लिए वो अपनी कुछ बात बताना चाहते हैं, उस पर भी रोक लगा दी जा रही है। कोई भी दल हो, हमें किसी को भी, हमारी ये नई पीढ़ी के आ रहे नौजवान सांसद, पहली बार आए हुए सांसद, उनको अवसर देना चाहिए, उनके अनुभवों का हमें, सदन को लाभ मिलना चाहिए। इस नई पीढ़ी के अनुभव सदन के माध्यम से राष्ट्र को भी लाभान्वित करेंगे। और इसलिए मेरा आग्रह रहेगा कि हम इन चीजों को गंभीरता से लें। ड्रामा करने के लिए जगह बहुत होती है, जिसको करना है, करते रहें। यहां ड्रामा नहीं, डिलीवरी होनी चाहिए। नारे के लिए भी जितने नारे बुलवाने हैं, पूरा देश खाली पड़ा है। जहां पराजित होकर के आए हैं, वहां बोल चुके हो। जहां अभी पराजय के लिए जाने वाले हो, वहां भी बोल दीजिए। लेकिन यहां तो नारे नहीं, नीति पर बल देना चाहिए। और वो आपकी नियत होनी चाहिए।



