मार्गशीर्ष पूर्णिमा: हरिहर स्नान और दान-पुण्य का विशेष महत्व

निश्चय टाइम्स, डेस्क। हिंदू पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा अत्यंत पवित्र और पुण्यदायिनी मानी गई है। इस दिन किया गया स्नान, दान और पूजा कई गुना फलदायी होती है। मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा हिन्दू पंचांग में अत्यंत पवित्र और शुभ मानी जाती है। इसे भक्ति, दान और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर माना जाता है। पंचांग के अनुसार पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 4 दिसंबर की प्रातः 08:38 बजे से होगी और इसका समापन 5 दिसंबर की प्रातः 04:43 बजे होगा। वैदिक मान्यताओं के अनुसार, मार्गशीर्ष मास में की गई पूजा, व्रत और दान का फल अन्य मासों की तुलना में कई गुना अधिक मिलता है। विशेष रूप से ‘हरिहर स्नान’ का महत्व शास्त्रों में वर्णित है, जो भगवान विष्णु और भगवान शिव की संयुक्त शक्ति का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि अगहन पूर्णिमा पर हरिहरनाथ महादेव की आराधना और पवित्र संगमों में स्नान करने से जीवन की हर परेशानी दूर होती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। अगहन पूर्णिमा पर हरिहर स्नान का अर्थ है एक ही समय में विष्णु और शिव, दोनों की कृपा प्राप्त करना। यह स्नान पापों का नाश करता है, कष्टों से मुक्ति देता है और जीवन में दिव्य ऊर्जा का संचार करता है। सोनपुर स्थित हरिहरनाथ मंदिर के पास गंगा–गंडक संगम जैसे स्थानों पर किया गया यह स्नान विशेष पुण्यकारी माना गया है।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत व्यापक है। शास्त्रों के अनुसार यह मास भगवान विष्णु का प्रिय मास है, और ब्रह्माजी की कृपा भी इस समय विशेष रूप से प्राप्त होती है। इस दिन किया गया उपवास, जप, ध्यान, दान और गंगा स्नान कई गुना अधिक फल देता है। तुलसी पूजन, विष्णु सहस्रनाम का पाठ, घर में भजन–कीर्तन और दान–धर्म मन को शांति देता है तथा घर-परिवार में स्थिरता लाता है। माना जाता है कि इस पूर्णिमा का पुण्य मोक्ष की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर क्या करें?
- पवित्र नदी या गंगा में स्नान करें
- श्री हरि, मां अन्नपूर्णा और सूर्य देव का विशेष पूजन करें
- दीपदान, अन्नदान, गौदान और जरूरतमंदों की सेवा करें
- विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और घर में सत्संग–भजन का आयोजन करें
- ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा दें
मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर क्या न करें?
- असत्य, क्रोध और तामसिक भोजन से बचें
- किसी का अपमान, निंदा या अनादर न करें
- अनावश्यक विवाद, कटु वचन और मनमुटाव न करें
- दूसरों की वस्तुओं या अधिकारों का अनादर न करें



