उत्तर प्रदेश

महिला सुरक्षा पर सवालों के बीच यूपी राज्य महिला आयोग का दावा: “रात 12 बजे तक सुरक्षित हैं महिलाएं”, NCRB रिपोर्ट को बताया संदिग्ध

निश्चय टाइम्स डेस्क।

लखनऊ में आयोजित एक कार्यशाला के दौरान उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. बबीता सिंह चौहान के बयान ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। समाज कल्याण विभाग द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में महिला आयोग अध्यक्ष ने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) 2023 की रिपोर्ट को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है, इसलिए ऐसे आंकड़े “संदेह के घेरे में” रहते हैं।

डॉ. बबीता सिंह ने दावा किया कि वर्ष 2017 से पहले उत्तर प्रदेश में “जंगलराज” था, लेकिन वर्तमान में प्रदेश में अमन-चैन का माहौल है और महिलाएं रात 12 बजे भी बेखौफ घूम सकती हैं। उनके इस बयान पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि आए दिन प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से महिलाओं के साथ अपराध, छेड़छाड़, उत्पीड़न और घरेलू हिंसा की खबरें सामने आती रही हैं।

महिला संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि NCRB जैसे संवैधानिक और आधिकारिक संस्थान के आंकड़ों को सार्वजनिक मंच से खारिज करना न केवल गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि महिलाओं की वास्तविक समस्याओं को नकारने जैसा भी है। आलोचकों का आरोप है कि महिला आयोग का दायित्व सरकार के दावों की पुष्टि करना नहीं, बल्कि पीड़ित महिलाओं की आवाज़ बनना है।

कार्यशाला के दौरान महिला आयोग और किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज (KGMU) के बीच कथित विवाद पर पूछे गए सवाल के जवाब में आयोग अध्यक्ष ने कहा कि “कुछ गलतफहमियां थीं, जिन्हें सुलझा लिया गया है।” हालांकि सूत्रों का कहना है कि हाल के महीनों में मेडिकल सहायता और महिला पीड़ितों के मामलों को लेकर संस्थानों के बीच टकराव की स्थिति बनी रही है, जिसे पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।

कार्यक्रम में समाज कल्याण विभाग की ओर से विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं पर प्रस्तुति दी गई और मासिक समीक्षा बैठक भी हुई, लेकिन जमीनी हकीकत पर ठोस चर्चा के बजाय उपलब्धियों और योजनाओं की औपचारिक समीक्षा तक ही बैठक सीमित रही। मिशन शक्ति, महिला जनसुनवाई और पोषण पंचायत जैसे अभियानों की समीक्षा जरूर की गई, परंतु अपराध पीड़ित महिलाओं की बढ़ती शिकायतों पर कोई स्पष्ट कार्ययोजना सामने नहीं रखी गई।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिला आयोग का यह रुख सरकार के बचाव में खड़ा नजर आता है, जिससे आयोग की निष्पक्षता और संवेदनशीलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। विपक्षी दलों ने भी महिला आयोग पर “सरकार का प्रवक्ता” बनने का आरोप लगाया है।

महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को लेकर किए गए ऐसे दावे, जब जमीनी स्तर पर कई पीड़ित न्याय की प्रतीक्षा में हैं, महिला आयोग की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।

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