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सिडबी को 5,000 करोड़ की इक्विटी सहायता: एमएसएमई के नाम पर सरकारी खजाने पर बढ़ता बोझ?

निश्चय टाइम्स डेस्क।





नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) को 5,000 करोड़ रुपये की इक्विटी सहायता देने को मंजूरी देकर एमएसएमई क्षेत्र को मजबूती देने का दावा किया है, लेकिन इस फैसले को लेकर कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में लिए गए इस निर्णय को जहां सरकार “रोजगार और ऋण प्रवाह बढ़ाने वाला कदम” बता रही है, वहीं अर्थशास्त्री और उद्योग विशेषज्ञ इसे सार्वजनिक धन के बढ़ते जोखिम के तौर पर देख रहे हैं।

सरकार के अनुसार, इस इक्विटी निवेश से सिडबी को सस्ती दरों पर संसाधन जुटाने में मदद मिलेगी और करीब 25.74 लाख नए एमएसएमई लाभार्थी जुड़ेंगे, जिससे लगभग 1.12 करोड़ रोजगार सृजन का अनुमान है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये आंकड़े कागजी अनुमानों पर आधारित हैं, जिनकी जमीनी हकीकत अक्सर अलग निकलती रही है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पहले से ही एमएसएमई के लिए कई ऋण योजनाएं—जैसे मुद्रा योजना, क्रेडिट गारंटी स्कीम और आपातकालीन ऋण गारंटी—चल रही हैं, तब फिर सिडबी को अतिरिक्त इक्विटी सहायता क्यों दी जा रही है? क्या मौजूदा योजनाएं अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहीं? यदि सिडबी की बैलेंस शीट पर जोखिम-भारित परिसंपत्तियां तेजी से बढ़ रही हैं, तो इसका सीधा अर्थ यह भी है कि ऋण डिफॉल्ट का खतरा बढ़ रहा है।

आलोचकों का यह भी कहना है कि सरकार बार-बार बैंकों और वित्तीय संस्थानों को पूंजी देकर उन्हें “सहारा” देती है, लेकिन एमएसएमई तक सस्ता और समय पर ऋण पहुंचने की समस्या जस की तस बनी हुई है। जमीनी स्तर पर छोटे उद्यमियों की शिकायत है कि कागजी प्रक्रियाएं, गारंटी की शर्तें और बैंकों की सख्ती अब भी बड़ी बाधा हैं।

इसके अलावा, रोजगार सृजन के जो आंकड़े बताए जा रहे हैं, वे औसत गणनाओं पर आधारित हैं, न कि वास्तविक नए रोजगार की पुष्टि पर। ऐसे में यह आशंका भी जताई जा रही है कि यह फैसला आगामी वर्षों में सरकारी वित्त पर अतिरिक्त दबाव डालेगा, जबकि लाभ सीमित वर्ग तक ही सिमट कर रह सकता है।

कुल मिलाकर, सिडबी को दी गई यह इक्विटी सहायता सरकार के इरादों को तो दर्शाती है, लेकिन इसके वास्तविक असर और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी खड़े करती है।

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