“जनसुनवाई में लापरवाही उजागर: अधिकारी गैरहाजिर, ओबीसी आरक्षण और न्याय पर उठे सवाल”

निश्चय टाइम्स डेस्क। लखनऊ में पिछड़ा वर्ग राज्य आयोग की जनसुनवाई एक बार फिर प्रशासनिक उदासीनता और विभागीय लापरवाही की भेंट चढ़ती नजर आई। 17 शिकायतों पर सुनवाई के दौरान कई अहम मामलों में संबंधित अधिकारियों की गैरहाजिरी सामने आई, जिससे फरियादियों को तत्काल राहत नहीं मिल सकी। पशु चिकित्साधिकारी के 404 पदों की सीधी भर्ती में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण शून्य किए जाने का मामला गंभीर चिंता का विषय बनकर उभरा, जिस पर आयोग अध्यक्ष राजेश वर्मा ने कड़ा रुख अपनाया, लेकिन वर्षों पुराने रोस्टर और भर्तियों का विवरण अब तक स्पष्ट न होना सिस्टम की विफलता को दर्शाता है।

जगन्नाथ प्रसाद गंगवार को भूखंड न दिए जाने के मामले में सक्षम अधिकारी की अनुपस्थिति पर आयोग की नाराजगी के बावजूद सुनवाई टल गई, जो यह बताती है कि आयोग के निर्देशों को भी हल्के में लिया जा रहा है। इसी तरह कानपुर देहात की प्रधानाध्यापिका नीलम के प्रकरण में बेसिक शिक्षा अधिकारी का न पहुंचना प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है।
हालांकि कुछ मामलों में भुगतान और कार्रवाई की जानकारी दी गई, लेकिन कई प्रकरणों में वर्षों बाद समाधान होना यह दर्शाता है कि पिछड़ा वर्ग से जुड़े मामलों में न्याय प्रक्रिया धीमी और टालमटोल भरी है। जनसुनवाई मंच पर समस्याएं गिनाई जाती रहीं, पर अधिकारियों की लापरवाही और देरी ने व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया।


