हेल्थ

मोटापे की समस्या के समाधान हेतु बहुआयामी पहल की जरूरतः आर्थिक समीक्षा

बच्चों में डिजिटल व्यसन को नियंत्रित करने हेतु प्रज्ञात ढांचा और ऑनलाइन गेमिंग (विनियमन) अधिनियम 2025 जैसी पहलों का समावेश

आर्थिक समीक्षा ने ‘स्वास्थ्य हॉट-स्पॉट’ की पहचान हेतु एआई एवं प्रौद्योगिकी आधारित समीक्षाओं की भूमिका को रेखांकित किया


निश्चय टाइम्स डेस्क। देश ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश के जरिए बेहतर एवं किफायती सुविधाएं प्रदान कर स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। ये सार्वजनिक निवेश रक्षात्मक एवं निवारक देखभाल, पोषण और स्वास्थ्य बीमा प्रणाली को अधिक सुलभ बनाने के उद्देश्य से किए गए हैं। शिशु एवं मातृ मृत्यु दर में कमी लाई गई है, सार्वभौमिक टीकाकरण के कवरेज का विस्तार किया गया है और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा की सुलभता को बेहतर बनाया गया है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, आयुष्मान भारत एवं विविध बीमारियों के नियंत्रण संबंधी कार्यक्रम जैसी पहलों ने इस प्रगति को गति दी है।

केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण द्वारा आज संसद में पेश की गई आर्थिक समीक्षा 2025-26 में मानव पूंजी और आर्थिक उत्पादकता मजबूत करने हेतु सार्वजनिक स्वास्थ्य की उन्नति के महत्व पर ध्यान आकर्षित किया गया है।

बेहतर स्वास्थ्य मानकः

आर्थिक समीक्षा में इस तथ्य को रेखांकित किया गया है कि 1990 के बाद से, भारत ने मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) में 86 प्रतिशत की कमी दर्ज की है, जो वैश्विक औसत 48 प्रतिशत से कहीं अधिक है। इसी प्रकार, पांच वर्ष से कम आयु की मृत्यु दर (यू5एमआर) में 78 प्रतिशत की गिरावट हासिल की गई, जो 1990-2023 के दौरान वैश्विक स्तर पर 54 प्रतिशत की तुलना में 61 प्रतिशत की वैश्विक कमी और नवजात मृत्यु दर (एनएमआर) में 70 प्रतिशत की गिरावट से अधिक है।

महत्वपूर्ण रूप से, पिछले दशक में शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) में 37 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है और यह 2013 में प्रति हजार जीवित जन्मों पर 40 से घटकर 2023 में 25 हो गई है। यह नवजात शिशु एवं मातृत्व देखभाल के साथ-साथ समग्र स्वास्थ सेवा एवं सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में आये सुधार को दर्शाता है।

बेहतर स्वास्थ्य सेवा हेतु डिजिटल तकनीकः आर्थिक समीक्षा में बताया गया है कि डिजिटल प्रौद्योगिकियों और आईसीटी में हुए नवाचारों का सदुपयोग करते हुए पारदर्शिता बढ़ाने, व्यवस्था के विखंडन को कम करने तथा स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच का विस्तार करने वाली एकीकृत स्वास्थ्य एवं बीमा प्रणालियों का निर्माण किया गया है। हॉस्पिटल मैनेजमेंट इन्फॉर्मेशन सिस्टम, आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम) तथा ई-संजीवनी जैसी पहलों ने नागरिकों की डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को सुदृढ़ किया है, डिजिटल रोजगार के अवसर सृजित किए हैं, साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को सक्षम बनाया है और अस्पताल प्रबंधन को बेहतर बनाया है।

नए युग की स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं

मोटापाः भारत में मोटापा चिंताजनक तेजी से बढ़ रहा है और यह प्रमुख स्वास्थ्य संबंधी चुनौती बन गया है। स्वास्थ्य के लिए हानिकारक आहार, भागदौड़ भरी जिंदगी सहित जीवन-शैली में बदलाव, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (यूपीएफ) का अत्यधिक सेवन सभी आयुवर्ग के लोगों को प्रभावित कर रहा है और मधुमेह (डायबिटीज), हृदयरोग और हाइपरटेंशन जैसे गैर-संक्रामक रोगों (एनसीडी) का खतरा बढ़ रहा है।

वर्ष 2019-21 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के अनुसार 24 प्रतिशत भारतीय महिलाओं और 23 प्रतिशत भारतीय पुरुष मोटापे के शिकार हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि अधिक वजन की समस्या के शिकार पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की संख्या 2015-16 में 2.1 प्रतिशत से बढ़कर 2019-21 में 3.4 प्रतिशत हो गई।

मोटापे को एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में पहचानते हुए, सरकार ने कई पहल शुरू की हैं ताकि स्वास्थ्य, पोषण, शारीरिक गतिविधि, खाद्य सुरक्षा और जीवनशैली में सुधार को एकीकृत करते हुए समग्र दृष्टिकोण अपनाया जा सके। पोषण अभियान एवं पोषण 2.0, फिट इंडिया मूवमेंट, खेलो इंडिया, ईट राइट इंडिया, राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान – आज से थोड़ा कम जैसे कदम इन पहलों के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इसके अलावा, एफएसएसएआई ने ‘मोटापा रोकें, मोटापा भगाएं – मोटापा रोकने हेतु जागरूकता पहल’ अभियान शुरू किया है।

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (यूपीएफ) लंबे समय से स्थापित आहार पैटर्न को विस्थापित कर रहे हैं, जिससे आहार की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है तथा ये अनेक दीर्घकालिक रोगों के बढ़े हुए जोखिम से जुड़े हुए हैं। आर्थिक समीक्षा में आहार संबंधी सुधारों को सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता बताई गई है। भारत यूपीएफ की बिक्री के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है। वर्ष 2009 से 2023 तक इसमें 150 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई। यह तथ्य मोटापे के प्रभावी प्रबंधन हेतु स्थानीय स्तर पर पैदा किये गये खाद्यान्नों, पारम्परिक आहारों तथा आयुष (योग को बढ़ावा) जैसी पारम्परिक प्रणालियों को लोकप्रिय बनाने की जरूरत की ओर संकेत करता है।

डिजिटल व्यसनः आर्थिक समीक्षा में बच्चों में डिजिटल व्यसन की बढ़ती समस्या पर प्रकाश डाला गया है।   डिजिटल व्यसन लगातार विचलन, ‘नींद की कमी’ और कम एकाग्रता के कारण शैक्षणिक प्रदर्शन और कार्यस्थल की उत्पादकता को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है। यह सामाजिक पूंजी को भी कमजोर कर रहा है। आर्थिक समीक्षा में इस समस्या के समाधान के लिए सरकार द्वारा उठाए गये विभिन्न कदमों का उल्लेख किया गया है। सीबीएसई ने स्कूलों और स्कूल बसों में सुरक्षित इंटरनेट उपयोग पर दिशा-निर्देश जारी किए हैं। शिक्षा मंत्रालय का प्रज्ञात ढांचा डिजिटल शिक्षा की योजना बनाते समय स्क्रीन टाइम पर ध्यान देने का मार्गदर्शन करता है। वहीं, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने स्क्रीन टाइम की सीमाओं और ऑनलाइन सुरक्षा के संबंध में दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

मानसिक स्वास्थ्य संकटः युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य में आई गिरावट और डिजिटल व्यसन के बीच निकट संबंध है। विविध भारतीय एवं वैश्विक अध्ययनों ने 15-24 वर्ष के युवाओं में सोशल मीडिया के बढ़ते व्यसन की पुष्टि की है। सोशल मीडिया के व्यसन का जुड़ाव घबराहट, अवसाद, आत्मविश्वास में कमी और साइबरबुलिंग से उपजे दबाव के साथ भी है। भारतीय युवाओं को परेशान करने वाली अन्य समस्याओं में कंपल्सिव स्क्रॉलिंग, सामाजिक तुलना और गेमिंग से जुड़ी विकृतियां शामिल हैं। ये समस्याएं किशोरों में नींद की कमी, आक्रामकता, सामाजिकता में कमी और अवसाद को जन्म देती हैं।

इसलिए, आर्थिक समीक्षा में इस समस्या से निपटने हेतु सरकार द्वारा उठाए गये विभिन्न कदमों का उल्लेख किया गया है। उदाहरण के लिए, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (एमओएचएफडब्ल्यू) द्वारा अक्टूबर 2022 में शुरू की गई टेली-मानस (राज्यों में टेली मानसिक स्वास्थ्य सहायता और नेटवर्किंग) सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 24/7 टोल-फ्री मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन (14416) प्रदान करती है, जो कॉल करने वालों को निःशुल्क प्रशिक्षित पेशेवरों से जोड़ती है। वर्ष 2024 में लॉन्च किए गए टेली-मानस ऐप ने पहुंच का और विस्तार किया। इस सेवा को इसके शुभारंभ के बाद से 32 लाख से अधिक कॉल प्राप्त हुए हैं, जो इसकी प्रासंगिकता और प्रभाव को दर्शाते हैं। निमहान्स, बेंगलुरु में शट (प्रौद्योगिकी के स्वस्थ उपयोग के लिए सेवा) क्लिनिक किशोरों और युवा वयस्कों पर ध्यान केंद्रित करते हुए अत्यधिक और अनिवार्य प्रौद्योगिकी उपयोग के लिए विशेष देखभाल प्रदान करता है। यह स्वस्थ स्क्रीन-टाइम अभ्यास का समर्थन करने के लिए माता-पिता के लिए मुफ्त ऑनलाइन सत्र भी आयोजित करता है। ऑनलाइन गेमिंग (विनियमन) अधिनियम, 2025, युवाओं में डिजिटल व्यसन और वित्तीय हानि को नियंत्रित करने के एक महत्वपूर्ण कदम का प्रतिनिधित्व करता है।

डेटा के महत्व को स्वीकार करते हुए, निमहान्स द्वारा संचालित तथा एमओएचएफडब्ल्यू द्वारा स्वीकृत आगामी दूसरे राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएमएचएस) द्वारा भारतीय संदर्भ में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं से संबंधित मौलिक एवं कार्रवाई योग्य दृष्टिकोण हासिल होने की उम्मीद है।

आर्थिक सर्वेक्षण में विशेष रूप से शहरी झुग्गियों एवं ग्रामीण इलाकों में डिजिटल स्पेस का विकल्प प्रदान करने के उद्देश्य से ऑफलाइन यूथ हब की स्थापना का उल्लेख किया गया है। इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कि डिजिटल पहुंच को पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता, स्कूलों या इसी प्रकार के संस्थानों द्वारा नियंत्रित ऑनलाइन स्पेस की व्यवस्था का सुझाव दिया गया है। डिजिटल आदतों को आकार देने में स्कूल अहम भूमिका निभाते हैं और इसलिए उन्हें एक ऐसा डिजिटल वेलनेस पाठ्यक्रम शुरू करने का सुझाव दिया गया है, जिसमें स्क्रीन टाइम, साइबर सुरक्षा एवं मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारियों का समावेश हो।

एआई का उपयोग और प्रौद्योगिकी-आधारित समीक्षाः आर्थिक समीक्षा में यूडीआईएसई़+, एआईएसएचई, एबीडीएम जैसे प्लेटफॉर्मों का उपयोग करके की गई प्रौद्योगिकी आधारित समीक्षाओं और एआई उपकरणों के एकीकरण के माध्यम से ‘स्वास्थ्य हॉटस्पॉट’, जैसे कि शहरी झुग्गियों में मोटापे की उच्चता या उप-शहरी स्कूलों में डिजिटल व्यसन के बढ़ने की पहचान किये जाने के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। सार्वजनिक-निजी भागीदारी भारत में फ्रंटलाइन श्रमिकों के नेतृत्व वाली पहल विकसित करने में मदद कर सकती है, जिसमें मोबाइल ऐप, एआई चैटबॉट (आशा बॉट) और डिजिटल डैशबोर्ड (उदाहरण के लिए, आशा किराना की एम-कैट और आशा डिजिटल स्वास्थ्य) जैसी प्रौद्योगिकी को नियोजित किया जा सकता है, ताकि मधुमेह जैसी दीर्घकालिक बीमारियों का प्रभावी ढंग से प्रबंधन किया जा सके, कोविड-19 सहित संक्रामक रोगों की निगरानी और मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य परिणामों में सुधार सुनिश्चित की जा सके।

देश की वास्तविक क्षमता को साकार करने के उद्देश्य से भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र, विशेषकर सीडीएस एवं एनसीडी के दोहरे बोझ, बढ़ते डिजिटल व्यसन, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं, पोषण की कमी और बढ़ता हुआ मोटापा जैसे नए और परस्पर जुड़े मुद्दों को संबोधित करने पर निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है। एक बेहतर भविष्य को सुनिश्चित करने हेतु शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य सहित एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

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