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नालसा के दावों पर बहस, क्या गरीबों को मिल रहा है असली न्याय?

मुफ्त कानूनी सहायता पर सवाल, क्या कागजों तक सीमित है निगरानी तंत्र?

निश्चयट टाइम्स डेस्क।

देश में सभी को समान न्याय दिलाने के दावों के बीच राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) की व्यवस्थाओं पर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। सरकार का कहना है कि निःशुल्क और सक्षम विधिक सेवाएं विनियम, 2010 के तहत कानूनी सहायता की गुणवत्ता की निगरानी के लिए मजबूत ढांचा मौजूद है, लेकिन जमीनी हकीकत को लेकर कानूनी विशेषज्ञ और सामाजिक संगठनों का एक वर्ग संतुष्ट नजर नहीं आ रहा।

राज्यसभा में कानून और न्याय मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने बताया कि निगरानी एवं परामर्श समितियां (MMC) कानूनी सहायता मामलों की प्रगति पर नजर रखती हैं और जरूरत पड़ने पर पैनल वकीलों को हटाने तक की कार्रवाई कर सकती हैं। हालांकि, सवाल यह है कि जब व्यवस्था इतनी सख्त बताई जा रही है, तो फिर अदालतों में वर्षों से लंबित पड़े कानूनी सहायता वाले मामलों का बोझ क्यों कम नहीं हो पा रहा?

विनियमों में हर केस की दिन-प्रतिदिन निगरानी, रजिस्टर जांच और प्रदर्शन मूल्यांकन की बात कही गई है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह सिस्टम अक्सर “पेपर मॉनिटरिंग” बनकर रह जाता है। गरीब और हाशिए पर खड़े लोगों को समय पर वकील नहीं मिलना, मामलों में देरी और सीमित संसाधनों जैसी शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं।

सरकार का दावा है कि पैनल वकीलों के कौशल को बढ़ाने के लिए नियमित प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, ताकि लाभार्थियों को बेहतर प्रतिनिधित्व मिल सके। मगर कानूनी जानकारों का कहना है कि केवल प्रशिक्षण से समस्या हल नहीं होगी—जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी और प्रदर्शन पर वास्तविक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक मुफ्त कानूनी सहायता का उद्देश्य अधूरा रह सकता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह पूरा तंत्र वास्तव में न्याय तक “समान और प्रभावी पहुंच” सुनिश्चित कर पा रहा है, या फिर यह व्यवस्था सिर्फ नीतियों और रिपोर्टों में ही मजबूत दिखाई देती है? क्योंकि न्याय में देरी, न्याय से वंचित होने के बराबर मानी जाती है।

अब निगाह इस बात पर है कि सरकार इन व्यवस्थाओं को और पारदर्शी व परिणाम आधारित बनाने के लिए क्या ठोस कदम उठाती है—ताकि मुफ्त कानूनी सहायता केवल घोषणा न रह जाए, बल्कि जरूरतमंदों के लिए असली सहारा बन सके।

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