‘हाशिए की आवाज़’ या चयनित एजेंडा? विजय विनीत की पत्रकारिता पर बहस तेज
इस बहस के बीच एक बात स्पष्ट है — विजय विनीत ने अपनी पत्रकारिता से सुर्खियां भी बटोरी हैं और सवाल भी खड़े किए हैं।

निश्चय टाइम्स डेस्क। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक विजय विनीत को लंबे समय से हाशिए के समाज की सशक्त आवाज़ के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। उनकी रिपोर्टिंग दलित, वंचित, गरीब और श्रमिक वर्ग के मुद्दों को प्रमुखता से उठाती रही है। समर्थकों का कहना है कि उनकी कलम उन लोगों की पीड़ा से जन्म लेती है, जिन्हें अक्सर व्यवस्था और मुख्यधारा की मीडिया नजरअंदाज कर देती है।
हालांकि, हाल के दिनों में उनकी पत्रकारिता को लेकर बहस भी तेज हुई है। आलोचकों का आरोप है कि विनीत की रिपोर्टिंग सामाजिक सरोकारों के नाम पर एक “चयनित नैरेटिव” को आगे बढ़ाती है, जिसमें व्यवस्था की आलोचना प्रमुख रहती है, लेकिन व्यापक परिप्रेक्ष्य कम दिखाई देता है। कुछ का मानना है कि उनकी लेखनी खबर से अधिक एक्टिविज्म की ओर झुकती दिखती है।
विजय विनीत का पक्ष है कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता से सवाल करना और कमजोर वर्ग की आवाज़ बनना है। वे कहते हैं कि “अगर सच असहज करता है, तो यह पत्रकार की विफलता नहीं, बल्कि समाज की सच्चाई है।” उनकी बेबाक बातचीत और तीखे सवालों ने उन्हें एक निर्भीक पत्रकार की पहचान दी है।
फिर भी, मीडिया के बदलते परिदृश्य में यह सवाल उठ रहा है कि क्या संवेदनशील पत्रकारिता और वैचारिक झुकाव के बीच की रेखा धुंधली हो रही है? क्या सामाजिक न्याय की लड़ाई को कवर करना निष्पक्षता से समझौता है या यह पत्रकारिता की जिम्मेदारी?
विजय विनीत की लेखनी ने निश्चित रूप से हाशिए पर खड़े व्यक्ति को मंच दिया है, लेकिन साथ ही यह बहस भी खड़ी कर दी है कि पत्रकार की भूमिका सिर्फ दर्शक की होनी चाहिए या परिवर्तन के वाहक की।



