कागज़ों में हरित क्रांति, ज़मीनी हकीकत सवालों में
: GST कटौती से राहत या सिर्फ़ आंकड़ों का खेल?

पर्यावरण के नाम पर नीति, फायदा किसे?
निश्चय टाइम्स न्यूज नेटवर्क (DF हिंदी)
भारत सरकार द्वारा जीएसटी के विवेकीकरण को “हरित परिवर्तन” की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसके प्रभाव को लेकर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में किए गए इन फैसलों को पर्यावरण संरक्षण के रूप में पेश किया गया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम अधिकतर कागजी और सीमित प्रभाव वाला हो सकता है।
अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में सीईटीपी सेवाओं पर जीएसटी 12% से घटाकर 5% करने की घोषणा की गई है, लेकिन छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए वास्तविक राहत कितनी मिलेगी, यह स्पष्ट नहीं है। कई उद्योग पहले ही उच्च संचालन लागत और तकनीकी बाधाओं से जूझ रहे हैं। ऐसे में केवल टैक्स घटाने से संरचनात्मक समस्याएं हल नहीं होंगी।
इसी तरह बायो डिग्रेडेबल उत्पादों पर टैक्स में कटौती को प्लास्टिक प्रदूषण के समाधान के रूप में पेश किया जा रहा है, जबकि सच्चाई यह है कि भारत में अभी भी इन उत्पादों की उपलब्धता, गुणवत्ता और जागरूकता बेहद सीमित है। कीमतों में मामूली कमी से उपभोक्ता व्यवहार में बड़ा बदलाव आना मुश्किल है।
हरित परिवहन के नाम पर बसों और मालवाहक वाहनों पर जीएसटी घटाकर 18% करना भी सवालों के घेरे में है। परिवहन क्षेत्र में ईंधन लागत, मेंटेनेंस और इंफ्रास्ट्रक्चर की समस्याएं अधिक गंभीर हैं, जिन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है। केवल टैक्स में कटौती से प्रदूषण में वास्तविक कमी आना संदिग्ध है।
कुल मिलाकर, यह नीति “हरित बदलाव” से ज्यादा एक आर्थिक पुनर्संतुलन का प्रयास नजर आती है, जिसमें पर्यावरण का मुद्दा एक नैरेटिव के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। जब तक ठोस कार्यान्वयन, निगरानी और व्यापक सुधार नहीं होते, तब तक यह पहल अपेक्षित परिणाम देने में असफल रह सकती है।



