सुप्रीम कोर्ट ने 104 वर्षीय रसिक चंद्र मंडल को उनकी वृद्धावस्था और स्वास्थ्य समस्याओं को ध्यान में रखते हुए अंतरिम जमानत देने का फैसला सुनाया। यह फैसला चीफ जस्टिस संजीव खन्ना की अगुवाई वाली बेंच ने शुक्रवार (29 नवंबर) को सुनाया। मंडल को अब ट्रायल कोर्ट की शर्तों के आधार पर अस्थायी रूप से रिहा किया जाएगा।
1988 के हत्याकांड में दोषी पाए गए थे मंडल
रसिक चंद्र मंडल को 1988 के एक हत्याकांड में 1994 में दोषी ठहराया गया था। उस समय उनकी उम्र 68 वर्ष थी। उन्हें इस मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। इसके बाद उन्होंने अपनी सजा के खिलाफ अपील की, लेकिन 2018 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने उनकी अपील को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट में भी उन्हें पहले कोई राहत नहीं मिल सकी थी।
2020 में सुप्रीम कोर्ट में लगाई थी गुहार
2020 में, मंडल ने अपनी बुढ़ापे और स्वास्थ्य समस्याओं का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक नई अपील दायर की। उस समय उनकी उम्र 99 साल थी। मंडल ने समय से पहले रिहाई की मांग करते हुए कहा था कि उनकी स्थिति कारावास झेलने लायक नहीं है।
पश्चिम बंगाल सरकार से मांगी गई थी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पश्चिम बंगाल सरकार से रिपोर्ट तलब की थी। 2021 में कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया और मंडल की हालत पर गौर किया।
स्वास्थ्य के आधार पर राहत
शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने मंडल की वृद्धावस्था और स्वास्थ्य समस्याओं को ध्यान में रखते हुए अंतरिम जमानत का आदेश दिया। पश्चिम बंगाल सरकार की वकील आस्था शर्मा ने अदालत को बताया कि मंडल की शारीरिक स्थिति अब पहले से बेहतर है और वे जल्द ही अपना 104वां जन्मदिन मनाएंगे।
अंतरिम जमानत का मतलब
इस आदेश के बाद रसिक चंद्र मंडल को ट्रायल कोर्ट की शर्तों के तहत अस्थायी रूप से रिहा किया जाएगा। हालांकि, इस मामले में अंतिम निर्णय और उनकी सजा पर पुनर्विचार का विकल्प अभी भी खुला है।
मानवता के आधार पर फैसला
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला वृद्ध कैदियों के प्रति न्यायिक संवेदनशीलता को दर्शाता है। मंडल की जमानत न केवल उनके व्यक्तिगत हालातों को ध्यान में रखती है, बल्कि न्याय प्रणाली में मानवता की एक झलक भी पेश करती है।