अच्छे दिन आने वाले हैं’ का नारा देने वाले विज्ञापन गुरु पीयूष पांडे का 70 वर्ष की आयु में निधन

भारतीय विज्ञापन जगत के दिग्गज और रचनात्मकता के प्रतीक पीयूष पांडे का 70 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने गुरुवार को अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से पूरा विज्ञापन और कॉर्पोरेट जगत शोक में डूब गया है। पीयूष पांडे को भारत के आधुनिक विज्ञापन की आत्मा कहा जाता था — एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने देश की विज्ञापन भाषा, भाव और शैली को नई दिशा दी।
1955 में जन्मे पीयूष पांडे का जीवन प्रेरणादायक रहा। क्रिकेटर से विज्ञापन की दुनिया में कदम रखने वाले पांडे ने 1982 में ओगिल्वी इंडिया में अपना करियर शुरू किया। उस समय विज्ञापन जगत अंग्रेज़ी के प्रभुत्व में था, लेकिन उन्होंने भारतीयता को केंद्र में रखते हुए विज्ञापनों को लोगों के दिलों से जोड़ दिया। उनके बनाए कैंपेन में एशियन पेंट्स का “हर खुशी में रंग लाए”, कैडबरी का “कुछ खास है”, फेविकोल के मज़ेदार विज्ञापन और हच का “यू एंड आई” जैसे यादगार अभियान शामिल हैं, जिन्होंने ब्रांडों को घर-घर में लोकप्रिय बना दिया।
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने हिंदी और भारतीय बोलचाल के मुहावरों को विज्ञापन की मुख्यधारा में लाकर उसे आम लोगों के करीब बनाया। उनके सहयोगियों का कहना था — “पीयूष पांडे ने न केवल भारतीय विज्ञापन की भाषा बदली, बल्कि उसका व्याकरण भी बदल दिया।”
राजनीतिक अभियानों में भी उनका योगदान अविस्मरणीय रहा। उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए दो ऐतिहासिक नारे गढ़े — “अबकी बार मोदी सरकार” और “अच्छे दिन आने वाले हैं”। ये नारे भारतीय राजनीति की दिशा तय करने वाले साबित हुए और पीयूष पांडे का नाम इतिहास में अमर हो गया। उनका परिवार भी कला और सृजन से जुड़ा रहा है। उनके नौ भाई-बहनों में प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक प्रसून पांडे और चर्चित गायिका-अभिनेत्री इला अरुण भी शामिल हैं। पीयूष पांडे ने चार दशक से अधिक समय ओगिल्वी इंडिया में बिताए और कंपनी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उनके निधन से भारतीय विज्ञापन जगत में एक युग का अंत हो गया है। आज पूरा देश उस शख्स को याद कर रहा है जिसने कहा था — “विज्ञापन बेचना नहीं, जोड़ना सिखाता है।



