नई दिल्ली। आगामी उपचुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की सीटों पर समाजवादी पार्टी (सपा) को मजबूत समर्थन देने के उद्देश्य से अपने उम्मीदवार न उतारने का फैसला किया है। इंडिया गठबंधन के दिल्ली के सूत्रों का कहना है कि इस निर्णय के पीछे राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच बनी विशेष समझ है। सूत्रों के अनुसार, राहुल गांधी ने हरियाणा चुनाव में सपा को मैदान से हटने के लिए मना लिया था, जिसके एवज में राहुल ने भी यूपी उपचुनाव से अपनी पार्टी को दूर रखने का निर्णय लिया।
भाजपा का कांग्रेस-सपा गठबंधन पर हमला
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी ने प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में सपा अध्यक्ष को चेतावनी देते हुए कहा कि कांग्रेस से दोस्ती उनके लिए भविष्य में घातक साबित हो सकती है। भाजपा नेताओं का दावा है कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को खत्म करने की नीति पर चलती है, और राज्यों में गठबंधन करके उनका अस्तित्व समाप्त कर देती है।
सपा में भी कांग्रेस से गठबंधन को लेकर मतभेद
कांग्रेस के साथ बढ़ती साझेदारी को लेकर सपा में भी एक धड़ा चिंतित है। यह माना जा रहा है कि यूपी में कांग्रेस का प्रभाव बढ़ने से सपा और अन्य क्षेत्रीय दलों की राजनीति कमजोर हो सकती है। सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने भी वर्ष 2017 के चुनावों के बाद कांग्रेस-सपा गठबंधन को दीर्घकालिक लाभकारी नहीं माना था।
यूपी में कांग्रेस के लिए रणनीतिक महत्व
उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें होने के कारण कांग्रेस इसे अत्यधिक प्राथमिकता दे रही है। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस केंद्र में वापसी के लिए यूपी में सपा के साथ समझौतापूर्ण रणनीति अपना रही है। राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने यह तय किया है कि सीटों की साझेदारी पर कोई भी निर्णय केवल शीर्ष नेतृत्व ही करेगा, जबकि स्थानीय इकाइयों को इस बारे में बोलने का अधिकार नहीं होगा।
लोकसभा चुनाव पर नजर
सूत्रों का कहना है कि भाजपा द्वारा कांग्रेस को सपा के लिए “घातक” बताने के आरोपों का सामना करने के लिए ही राहुल गांधी ने उपचुनाव से हटने का निर्णय लिया है। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व विधानसभा से अधिक लोकसभा चुनावों को प्राथमिकता दे रहा है, ताकि 2024 के आम चुनाव में सपा के साथ मिलकर भाजपा सरकार को केंद्र से हटाने के अपने लक्ष्य को मजबूती दी जा सके।