शिक्षा

कवियों ने महफिल लूटी, व्यंग्य में झलकी सियासत की कड़वी सच्चाई

दिव्यांगता, अस्मिता और समानता पर चर्चा—लेकिन बदलाव कितना असरदार?

सम्मेलन में विमर्श बनाम हकीकत: मंच पर संवेदना, जमीन पर सवाल कायम

निश्चय टाइम्स न्यूज नेटवर्क
डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में “समकालीन समय, समाज और साहित्य” जैसे गंभीर विषयों पर गहन विमर्श हुआ, लेकिन सवाल यह भी उठता रहा कि क्या ऐसे मंचीय संवाद वास्तविक सामाजिक बदलाव में तब्दील हो पाते हैं?

सम्मेलन में दिव्यांगता, लैंगिक समानता, दलित-आदिवासी अस्मिता और सामाजिक दायित्व जैसे मुद्दों पर वक्ताओं ने अपनी बात रखी। मुख्य अतिथि प्रो. हिमांशु शेखर झा ने समावेशी समाज की जरूरत पर जोर दिया, वहीं अध्यक्षता कर रहीं पद्मश्री विद्या विन्दु सिंह ने महिलाओं की स्थिति में बदलाव की आवश्यकता बताई। लेकिन इन विचारों के बीच यह सवाल भी उभरता रहा कि क्या ये चर्चाएं केवल शैक्षणिक दायरे तक सीमित रह जाती हैं?

विशेषज्ञों ने स्वीकार किया कि नीतियों और योजनाओं के बावजूद जमीनी स्तर पर अभी भी दिव्यांगजनों, महिलाओं और वंचित वर्गों को समान अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। ऐसे में केवल विमर्श और सेमिनार कितने प्रभावी हैं, इस पर बहस जरूरी है।

सम्मेलन का दूसरा पहलू कवि सम्मेलन रहा, जहां मंच पर व्यंग्य और हास्य के जरिए सामाजिक और राजनीतिक सच्चाइयों को उजागर किया गया। कवि पंकज प्रसून ने महंगाई पर तंज कसते हुए पेट्रोल और गैस को “खजाना” बताया, तो अशोक झंझटी ने सियासत पर करारा व्यंग्य करते हुए वर्तमान राजनीतिक माहौल की तस्वीर पेश की।

कवियों की पंक्तियों में जहां हंसी थी, वहीं एक गहरी बेचैनी भी झलक रही थी—महंगाई, राजनीति और सामाजिक विडंबनाओं को लेकर। यही कारण रहा कि श्रोता कभी ठहाके लगाते नजर आए तो कभी गंभीर चिंतन में डूब गए।

कुल मिलाकर, यह सम्मेलन विचारों का बड़ा मंच जरूर बना, लेकिन यह भी स्पष्ट हुआ कि समाज के ज्वलंत मुद्दों पर केवल चर्चा पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती इन विचारों को जमीनी बदलाव में बदलने की है।

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