राष्ट्रीय

रक्षा बजट का 100% खर्च—उपलब्धि या बढ़ते सैन्य दबाव का संकेत?

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद तेजी से बढ़ा सैन्य आधुनिकीकरण, खर्च में बड़ा उछाल

निश्चय टाइम्स न्यूज नेटवर्क)
रक्षा मंत्रालय ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 1.86 लाख करोड़ रुपये के पूंजीगत बजट का पूरा उपयोग कर लिया है। इसे सरकार बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है, लेकिन विशेषज्ञ इसे बढ़ते सैन्य दबाव और तेज़ी से बढ़ते रक्षा खर्च के संकेत के रूप में भी देख रहे हैं।

आंकड़ों के अनुसार, कुल रक्षा बजट का 99.62% उपयोग किया गया, जो पिछले वर्षों की तुलना में अधिक है। शुरुआत में 1.80 लाख करोड़ रुपये का आवंटन था, जिसे बाद में बढ़ाकर 1.86 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया। यह वृद्धि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद आधुनिकीकरण की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए की गई।

खर्च का बड़ा हिस्सा विमानों, एयरो इंजन और उन्नत हथियार प्रणालियों पर हुआ है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरण, मिसाइल और नौसेना के जहाज निर्माण पर भी भारी निवेश किया गया। सरकार का दावा है कि इससे सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को मजबूती मिलेगी और अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी।

हालांकि, रक्षा खर्च में लगातार बढ़ोतरी को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में 109 प्रस्तावों को ‘आवश्यकता की स्वीकृति’ (AoN) दी गई, जिनकी कुल लागत 6.81 लाख करोड़ रुपये है—जो पिछले वर्ष के मुकाबले कई गुना अधिक है। साथ ही, 2.28 लाख करोड़ रुपये के 503 खरीद अनुबंध भी किए गए।

विशेषज्ञों का मानना है कि जहां एक ओर यह आधुनिकीकरण जरूरी है, वहीं दूसरी ओर इतनी तेज़ी से बढ़ता रक्षा व्यय वित्तीय संतुलन और अन्य सामाजिक क्षेत्रों के बजट पर दबाव डाल सकता है।

सरकार ने अगले वित्त वर्ष 2026-27 के लिए पूंजीगत मद में 22% बढ़ोतरी के साथ 2.19 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया है, जो यह संकेत देता है कि रक्षा क्षेत्र में खर्च का यह ट्रेंड आगे भी जारी रहने वाला है।

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