घुसपैठियों की तरफदारी पड़ेगी राष्ट्र पर भारी

अरविंद कांत त्रिपाठी
(मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार)
निश्चय टाइम्स, लखनऊ। घुसपैठिए, किसी राजनीतिक दल के लिए तात्कालिक लाभ का सौदा हो सकते हैं लेकिन दीर्घकाल में घुसपैठियों के कारनामें राजनीतिक दल के साथ-साथ राष्ट्रीय अस्तित्व के लिए भी कठिन चुनौती बन जाते हैं। जिस समाज की “चेतन शक्ति” सिर्फ वर्तमान के सुख-साधनों तक सीमित होती है, उस राष्ट्र का घोर संकट में पड़ना निश्चित है। उदाहरण के लिए – फ्रांस, इटली, कनाडा, इंग्लैंड और अन्य यूरोपीय देशों की त्रासदी सामने है। इसी तरह लेबनान, एक खाता-पीता किंतु भविष्य की चुनौतियों से बेपरवाह ईसाई बाहुल्य राष्ट्र था। वह अपनी जमीन पर चल रहे षड्यंत्रों को समझ पाने में नाकाम रहा और धीरे-धीरे मुस्लिम बाहुल्य इस्लामिक राष्ट्र बन गया। इतना ही नहीं कश्मीरी हिंदुओं के किलोल से गुलजार कश्मीर की वादियां अगर उन्हीं के खून, चीत्कार और बलात्कार की व्यथा-कथा हैं तो उस भयानक कहानी के पीछे कश्मीरियों की सीमित दृष्टि और भविष्य के प्रति घोर निश्चिंतता ही मिलती।…और पीछे जाने पर भारतीय इतिहास अपना सिर पीटते मिलता है कि भारतीय राजाओं, महाराजाओं की सुख और ऐश्वर्य भोगते रहने की प्रवृत्ति तथा पड़ोसी राजाओं से परस्पर शत्रुता के कारण भारत पहले मुगलों का, फिर पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी और अंग्रेजों का गुलाम बना। लुटा गया और उनके पैरों तले रौंदा गया।
सीधा सा नियम है – जिसका घर है, जिसकी जमीन है, वही उसका मालिक है। उसके घर और जमीन पर किसी बाहरी का अधिकार नहीं हो सकता है। परिस्थिति विशेष में बाहरी व्यक्ति एक समय सीमा तक शरणार्थी रूप में रह सकता है, लेकिन उस घर या जमीन का मालिक बनकर नहीं। यद्यपि इस मूलभूत नियम की जानकारी छोटे से लेकर बड़े तक सभी को है। लेकिन “स्वार्थ के अंधेपन” में इस जानकारी को कबाड़ में डाल दिया जाता है। “स्वार्थ का यह अंधापन” राजनेता बनकर जीवन के अथाह सुख, ऐश्वर्य और शक्ति को निरंतर भोगते रहने वाला होता है।
इसी स्वार्थ में आकंठ बेचैन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उन बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को देश से बाहर करने की मुहिम में केंद्र सरकार से दो-दो हाथ करने पर आमादा हैं जिनकी संख्या और राष्ट्र विरोधी हरकतें चिंताजनक स्तर तक पहुंच चुकी है। करोड़ों बांग्लादेशी नदियों और जंगलों के जरिए घुसपैठ कर भारत में बस चुके हैं। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान बांग्लादेश (तब के पूर्वी पाकिस्तानी) से विस्थापित होकर भारत आए एक करोड़ बांग्लादेशी “शरणार्थी” पहले ही भारत के विभिन्न राज्यों, विशेषकर पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा और मेघालय में बस चुके हैं। शरणार्थियों की यह संख्या घुसपैठियों की संख्या से अलग है। ढाका विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री अबुल बरकत के अनुसार – भारत के विभिन्न राज्यों में लगभग 1 करोड़ 13 लाख बांग्लादेशी शरणार्थी रह रहे हैं। तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1971-72 में अपने यहां बांग्लादेशी शरणार्थियों को इस शर्त पर शरण दी थी कि युद्ध खत्म हो जाने पर सारे बांग्लादेशी शरणार्थियों को बांग्लादेश वापस बुला लेगा। लेकिन 1984 में इंदिरा जी की असमय मृत्यु के बाद बांग्लादेशी शरणार्थियों को वापस भेजने की वार्ता ठप हो गई। अभाग्य है देश का कि इंदिरा जी के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा यह महत्वपूर्ण मसला वर्षों तक राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखा जाता रहा।
समय बीतता रहा, तकनीकी बढ़ती रही और कुटिल सियासत तथा भ्रष्ट नौकरशाही की कृपा से फर्जी दस्तावेजों के जरिए वह घुसपैठिए अब भारत के नागरिक होने का दावा करने लगे हैं। वह भारत की भूमि, भवन और संसाधनों पर, नौकरी और कारोबारों पर काबिज हो चुके हैं। भारतीय चुनावी राजनीति को बड़े स्तर पर प्रभावित करने की क्षमता हासिल कर लेने वाले इन घुसपैठियों का बड़े इलाकों में दबदबा, रंगबाजी और निर्णायक प्रभाव कायम है। खबरें बताती हैं कि भारत में भारी संख्या में घुसपैठियों के कारण जनसांख्यिकी/डेमोग्राफी (सांप्रदायिक आबादी) में तेजी से बदलाव होता जा रहा है। भारत की संस्कृति और सभ्यता पर कब्जा करने की खतरनाक साजिश विस्तार ले रही है।
अब भारत के कथित “सभ्य राजनीतिक समाज” पर थोड़ा नजर। यहां – ‘ सभ्य राजनीतिक समाज’ का आशय – चुनाव लड़ने वाले, मतदान करने वाले और ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक की राजनीति में सक्रिय रहने वाले समाज से है। स्वतंत्रता के बाद “राजशाही और जमीदारी” (शोषण के पर्याय) को भले ही भारतीय संविधान से हटा दिया गया हो, लेकिन जनता में उनके महिमा गान से स्वयं को गर्वान्वित महसूस करने की प्रवृत्त आज भी यथावत है। जनता द्वारा आज भी ऐशोआराम और ठाठबाट से परिपूर्ण नामी-गिरामी नेताओं और उसकी संतानों को ही शासन करने योग्य मानना, उनके चरणरज लेकर खुद को धन्य समझने, उनकी भरपूर चाकरी (गुणगान) करना आदि ; गुलामी के दिनों वाले भारतीय चरित्र का ही रूपांतरण है। आज भी भारतीय समाज अपने जाति और धर्म के स्थापित नेताओं (जमींदारों) और उनके उत्तराधिकारी संतानों की इच्छा और विचार से अलग, अपनी स्वतंत्र राय बना पाने में असमर्थ है।
अमेरिका भी अपने यहां पैदा होने वाली ऐसी भयावह स्थिति से अपने राष्ट्र को सुरक्षित रखने के लिए अगर घुसपैठियों को चुन-चुनकर उनके देश भेज रहा है तो यह कार्य उसके राष्ट्रप्रेम का प्रमाण है। हम ऐसा नहीं कर पा रहे थे तो यह राष्ट्र के प्रति हमारी लफ्फाजी का प्रमाण था। अवैध प्रवासियों को अपने देश से बाहर करने में पूरा अमेरिकी जनमानस अपने राष्ट्रपति (डोनाल्ड ट्रंप) के साथ है। लेकिन भारत में स्थिति उलट है। भारत और अमेरिका का यही अंतर, अमेरिका को महाशक्ति बनाता है और हमें (भारत को) कछुए की गति में सीमित करता है।
ममता बनर्जी ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को पश्चिम बंगाल में नहीं होने देने का ऐलान किया था लेकिन रोक पाने में असमर्थ होने के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने मतदाता सूची से 30 लाख से अधिक ‘मृत मतदाताओं’ के नाम हटाए जाने को धांधली बताया है। टीएमसी का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने का घटनाक्रम बिहार की स्थिति की पुनरावृत्ति को दर्शाता है।
जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) द्वारा पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पहले ही बताया जा चुका है कि 30 लाख से अधिक नागरिकों की मृत्यु हो चुकी है और उनके आधार कार्ड निष्क्रिय कर दिए गए हैं। उधर भाजपा, ममता बनर्जी पर ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ का आरोप लगा रही है कि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में चल रहे एसआईआर से “डरी हुई” हैं क्योंकि एसआईआर से उन “घुसपैठियों” का पर्दाफाश हो जाएगा जिन्हें टीएमसी ने राज्य में अपने वोट बैंक के रूप में “पाला” है। पक्ष-विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला पारंपरिक और राजनीतिक है। पार्टियां आएंगी, जाएंगी लेकिन राष्ट्र को बचाए रखना अनिवार्य है। संवैधानिक संस्थाएं कभी भी पूर्णतः निर्विवाद नहीं हो सकती हैं। अपनी पराजय के बाद विपक्ष हमेशा सत्ता पक्ष पर संवैधानिक संस्थाओं (न्यायपालिका और चुनाव आयोग) के दुरुपयोग का आरोप लगाता है। लेकिन अपनी जीत पर ऐसे आरोप नदारद होते हैं। वस्तुतः राष्ट्र को सर्वोपरि रखने और चुनाव आयोग सहित अन्य संवैधानिक संस्थाओं पर पूरा भरोसा रखने की आवश्यकता है। ऐसा करके ही प्रजातंत्र और राष्ट्र को सुरक्षित रखा जा सकता है। वस्तुतः घुसपैठियों का मसला भारत, अमेरिका या किसी अन्य देश में बसने का नहीं बल्कि वहां की डेमोग्राफी बदल देने के लिए एक सुनियोजित षडयंत्र का हिस्सा है। पूर्ण संकल्प के साथ इस षडयंत्र से राष्ट्र को बचाए रखना आवश्यक है।



