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परमाणु सुधारों पर सरकार का दावा, लेकिन सुरक्षा, लागत और पारदर्शिता पर सवाल बरकरार

निश्चय टाइम्स डेस्क।

नई दिल्ली। केंद्र सरकार जहां भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को “निर्णायक मोड़” पर बताकर ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने का दावा कर रही है, वहीं विशेषज्ञों और पर्यावरण समूहों के बीच इसे लेकर गंभीर शंकाएं उभर रही हैं। मीडिया राउंड टेबल में केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने परमाणु क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोलने, नए नियमों और निवेश की बात कही, लेकिन आलोचकों का कहना है कि सरकार अभी भी कई अहम सवालों से बचती नजर आ रही है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार सावधानीपूर्वक परमाणु नियम बनाएगी और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा। हालांकि, परमाणु ऊर्जा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में “कड़े समय-सीमा” के बिना नियम बनाने की बात को आलोचक टालमटोल के रूप में देख रहे हैं। उनका कहना है कि नियमों में देरी निवेशकों के साथ-साथ आम जनता के लिए भी अनिश्चितता पैदा करती है।

निजी कंपनियों को परमाणु क्षेत्र में प्रवेश देने को लेकर भी विरोध के स्वर तेज हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु ऊर्जा पूरी तरह सार्वजनिक जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग करती है, जबकि निजी भागीदारी से लाभ को प्राथमिकता मिल सकती है और सुरक्षा से जुड़े जोखिम बढ़ सकते हैं। दायित्व ढांचे को “यथावत” रखने का सरकारी दावा भी संदेह के घेरे में है, क्योंकि आपूर्तिकर्ता और संचालक के बीच संविदात्मक समझौते भविष्य में कानूनी जटिलताएं पैदा कर सकते हैं।

लागत के मुद्दे पर मंत्री ने स्वीकार किया कि हल्के जल रिएक्टर महंगे हैं, लेकिन भविष्य में सस्ते होने की उम्मीद जताई। आलोचकों का कहना है कि “उम्मीद” के आधार पर नीति बनाना खतरनाक हो सकता है, खासकर तब जब परमाणु परियोजनाएं पहले ही समय और बजट से कई गुना आगे निकल चुकी हैं।

गगनयान मिशन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। जहां सरकार 2026-27 की समयसीमा बता रही है, वहीं हाल की प्रक्षेपण असफलताओं के बाद मिशन की तैयारियों और सुरक्षा मानकों पर पुनर्विचार की मांग की जा रही है। मंत्री द्वारा असफलताओं को “विश्वसनीयता की हानि नहीं” बताना भी आलोचकों को संतोषजनक नहीं लग रहा।

₹1 लाख करोड़ के आरडीआई कोष को लेकर भी पारदर्शिता पर सवाल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रयोगशाला से बाजार तक की दूरी पाटने के नाम पर कहीं यह कोष चुनिंदा संस्थानों और कंपनियों तक सीमित न रह जाए।

कुल मिलाकर, सरकार के बड़े दावे अपनी जगह हैं, लेकिन परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष और नवाचार जैसे क्षेत्रों में सुरक्षा, लागत और जवाबदेही को लेकर जनता के सवाल अब भी अनुत्तरित हैं।

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