शहरी विकास के दावे खोखले? कई जिलों में PNG सेवाएं अभी भी अधर में
NOC के जाल में फंसी स्वच्छ ऊर्जा योजना, मंत्री को खुद करनी पड़ी मॉनिटरिंग

बैठकें बहुत, जमीन पर काम कम: PNG विस्तार फाइलों में अटका
निश्चय टाइम्स न्यूज नेटवर्क:
विज्ञान भवन में आयोजित उच्च स्तरीय बैठक में भले ही ए.के. शर्मा ने उत्तर प्रदेश की सक्रियता का दावा किया हो, लेकिन हकीकत इससे काफी अलग नजर आ रही है। पीएनजी (पाइप्ड नेचुरल गैस) सेवाओं के विस्तार को लेकर वर्षों से योजनाएं बन रही हैं, मगर ज़मीनी स्तर पर यह पहल अभी भी कागजों और बैठकों तक सीमित दिखाई देती है।
बैठक में हरदीप सिंह पुरी सहित कई केंद्रीय मंत्रियों की मौजूदगी के बावजूद उत्तर प्रदेश के कई जिलों—बहराइच, श्रावस्ती, लखीमपुर खीरी, सिद्धार्थनगर और महाराजगंज—में एनओसी जैसे बुनियादी मुद्दे तक हल नहीं हो पाए हैं। सवाल उठता है कि जब अनुमति प्रक्रिया ही वर्षों तक लंबित रहेगी, तो आम जनता तक स्वच्छ ऊर्जा कब पहुंचेगी?
सरकार की ओर से यह कहना कि मंत्री स्वयं मॉनिटरिंग करेंगे, इस बात का संकेत भी देता है कि प्रशासनिक तंत्र अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहा है। अगर हर छोटी प्रक्रिया के लिए मंत्री स्तर पर हस्तक्षेप जरूरी हो जाए, तो सिस्टम की कार्यक्षमता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े होते हैं।
शहरी क्षेत्रों में स्वच्छ और सुरक्षित ऊर्जा उपलब्ध कराने की बात लंबे समय से दोहराई जा रही है, लेकिन हकीकत यह है कि कई नगर निकायों में बुनियादी ढांचा ही तैयार नहीं है। CGD (सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन) नेटवर्क के विस्तार की रफ्तार बेहद धीमी है, जिससे आम नागरिकों को अभी भी महंगे और प्रदूषणकारी विकल्पों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
यह बैठक एक बार फिर इस सच्चाई को उजागर करती है कि योजनाओं की घोषणाएं तो तेज़ हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन बेहद सुस्त। यदि समयबद्ध और पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित नहीं की गई, तो “विकसित शहरी भारत” का सपना सिर्फ भाषणों तक ही सीमित रह जाएगा।



