उत्तर प्रदेश

होली से पहले सरकार की सख्ती, सड़कों पर अव्यवस्था की आशंका

ओवरलोडिंग–ओवरस्पीडिंग पर अलर्ट, पर क्या सिस्टम खुद तैयार है?

24×7 कंट्रोल रूम के दावे, ज़मीनी हकीकत पर निगाहें


होली जैसे बड़े त्योहार से ठीक पहले उत्तर प्रदेश का परिवहन तंत्र एक बार फिर सख्त निर्देशों और उच्च स्तरीय बैठकों के भरोसे नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री स्तर पर हुई समीक्षा बैठक के बाद प्रदेश के परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह ने साफ शब्दों में कहा है कि त्योहारों के दौरान किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। लेकिन हर साल की तरह इस बार भी सवाल यही है कि क्या महज निर्देशों से अव्यवस्थाएं थम जाएंगी?

बैठक में परिवहन विभाग और निगम के वरिष्ठ अधिकारियों को ओवरलोडिंग, ओवरस्पीडिंग, बिना हेलमेट और बिना सीट बेल्ट वाहन चलाने वालों पर कड़ी निगरानी रखने के निर्देश दिए गए हैं। प्रदेश के राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर विशेष जांच अभियान चलाने की बात कही गई है। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि त्योहारों के दौरान अचानक बढ़ते यातायात दबाव में इन अभियानों का प्रभाव सीमित रह जाता है।

परिवहन मंत्री ने 28 फरवरी से 9 मार्च तक अतिरिक्त बसों के संचालन, विशेषकर दिल्ली से पूर्वी उत्तर प्रदेश की ओर अधिक फेरों की व्यवस्था करने का निर्देश दिया है। लखनऊ और कानपुर में भी अतिरिक्त बसों की तैनाती की बात कही गई है। लेकिन परिवहन निगम की पहले से सीमित बस संख्या, रखरखाव की चुनौतियां और चालक–परिचालकों की कमी को देखते हुए इन आदेशों के क्रियान्वयन पर सवाल उठ रहे हैं।

लंबी दूरी की बसों में दो ड्राइवर रखने का निर्देश यात्रियों की सुरक्षा के लिहाज से सकारात्मक दिखता है, पर वास्तविकता यह है कि विभाग पहले से ही स्टाफ की कमी से जूझ रहा है। यदि 100% बसों को ऑनरोड करने का लक्ष्य रखा गया है, तो अतिरिक्त ड्राइवरों की उपलब्धता कैसे सुनिश्चित होगी, यह स्पष्ट नहीं है।

सख्ती के नाम पर शराब पीकर वाहन चलाने वालों के खिलाफ ब्रेथ एनालाइजर जांच, ज्वलनशील पदार्थों पर प्रतिबंध और अनफिट बसों के संचालन पर रोक जैसे निर्देश दिए गए हैं। साथ ही 24×7 कंट्रोल रूम और अधिकारियों को फील्ड में तैनात रहने के आदेश भी जारी किए गए हैं। लेकिन पिछले वर्षों में भी इसी तरह के निर्देश जारी हुए थे, जिनका असर सीमित ही दिखा।

त्योहारों के दौरान दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या और अव्यवस्थित बस संचालन की शिकायतें हर साल सामने आती रही हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या इस बार सख्ती जमीनी स्तर तक पहुंचेगी या फिर यह भी केवल कागजी तैयारी बनकर रह जाएगी?

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