भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है यद्यपि इसकी प्रति व्यक्ति जीडीपी वर्तमान में 128वें स्थान पर है-एनसीएईआर उपाध्यक्ष

“भारत में स्वरोजगार की प्रधानता उद्यमशीलता की गतिशीलता के बजाय आर्थिक आवश्यकता के कारण है।
निश्चय टाइम्स डेस्क। भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है , और यद्यपि इसकी प्रति व्यक्ति जीडीपी वर्तमान में 128वें स्थान पर है। ये बातें नेशनल कॉंसिल ऑफ एप्लायड इकॉनोमिक रिसर्च (एनसीएईआर) के उपाध्यक्ष मनीष सभरवाल भारत में रोजगार की संभावनाएं रोजगार के रास्ते शीर्षक से एक अध्ययन रिपोर्ट जारी करते हुए कही। रिपोर्ट में कहा कि श्रम प्रधान विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों को सुदृढ़ करने से जीडीपी की वृद्धि दर को लगभग 8 प्रतिशत पर बनाए रखने में मदद मिल सकती है, जो विकसित भारत के विजन के अनुरूप है। प्रोफेसर अफरीदी ने कहा, “भारत में स्वरोजगार की प्रधानता उद्यमशीलता की गतिशीलता के बजाय आर्थिक आवश्यकता के कारण है। छोटे किसानों की तरह, अधिकांश लघु उद्यम निर्वाह स्तर पर ही काम करते हैं। भारत को इस वास्तविकता का सामना करना होगा कि उसका रोजगार भविष्य उसके सबसे छोटे उद्यमों की उत्पादकता से जुड़ा है।” मुख्य चुनौती यह है कि गैर-पंजीकृत घरेलू उद्यम पूंजी, उत्पादकता और प्रौद्योगिकी के निम्न स्तरों के साथ प्रचालन करते हैं।
उन्होंने कहा, “डिजिटल प्रौद्योगिकियों का उपयोग करने वाले उद्यम, तकनीक का उपयोग न करने वाले उद्यमों की तुलना में 78 प्रतिशत अधिक कर्मचारियों को नियुक्त करते हैं। यहां तक कि ऋण सुविधा में 1 प्रतिशत की वृद्धि से भी नियुक्त किए जाने वाले कर्मचारियों की अपेक्षित संख्या में 45 प्रतिशत की वृद्धि होती है।” विशिष्ट जनसांख्यिकीय लाभ के बावजूद रोजगार सृजन में बनी हुई चुनौतियों के संबंध में, रिपोर्ट में कहा गया है आपूर्ति पक्ष पर, भारत के कार्यबल को कौशल विकास-विशेष रूप से नई प्रौद्योगिकियों और एआई के आगमन से अत्यधिक लाभ हो सकता है। रोजगार वृद्धि में-खासकर सेवा क्षेत्र में-मध्यम-कुशल रोजगारों का दबदबा है जबकि विनिर्माण क्षेत्र निम्न कौशल-आधारित बना हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है, ष्औपचारिक कौशल विकास में निवेश के माध्यम से कुशल कार्यबल की हिस्सेदारी में 12 प्रतिशत अंकों की वृद्धि से 2030 तक श्रम-प्रधान क्षेत्रों में रोजगार में 13 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हो सकती है। अध्ययन में किए गए सिमुलेशन से पता चलता है कि मध्यम वृद्धि परिदृश्य के तहत औपचारिक रूप से कुशल कार्यबल को बढ़ाने से श्रम-प्रधान क्षेत्रों में महत्वपूर्ण रोजगार सृजन हो सकता है। इसमें कहा गया है, ष्कुशल कार्यबल की हिस्सेदारी में 9 प्रतिशत अंकों की वृद्धि से 2030 तक 93 लाख रोजगार सृजित हो सकते हैं।
रिपोर्ट पर चर्चा करते हुए, एनसीएईआर के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. जीसी मन्ना ने कहा कि यह रिपोर्ट रोजगार वृद्धि को गति देने की प्रबल क्षमता वाले प्रमुख सेक्टरों को रेखांकित करती है। औद्योगिक विकास अध्ययन संस्थान के विजिटिंग प्रोफेसर आदित्य भट्टाचार्य ने कहा, ष्यह रिपोर्ट भारत को अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में रखती है और उन क्षेत्रों को उजागर करती है जहां देश के पास सुधार और वैश्विक मानकों के साथ मजबूत तालमेल बिठाने के अनूठे अवसर हैं। रिपोर्ट में अंतर-क्षेत्रीय संबंधों के गुणक प्रभावों का आकलन करते हुए यह अनुमान लगाया गया है कि विनिर्माण और सेवाओं के भीतर अपेक्षाकृत अधिक श्रम-प्रधान उप-क्षेत्रों के सकल उत्पादन (जीओ) में मध्यम वृद्धि से 2030 तक कई गुना रोजगार सृजन होगा। विनिर्माण में वस्त्र, परिधान और संबंधित उद्योगों में 53 प्रतिशत और व्यापार, होटल और संबंधित सेवाओं में 79 प्रतिशत अधिक रोजगार सृजित होने की संभावना है। यह रिपोर्ट विशिष्ट सेक्टरों में रोजगार की संभावनाओं को बढ़ाने के लिए लक्षित उपायों की अनुशंसा करती है। विनिर्माण क्षेत्र में, उत्पादन-संबंधी प्रोत्साहनों को वस्त्र, परिधान, जूते और खाद्य प्रसंस्करण जैसे श्रम-प्रधान उद्योगों की ओर पुनर्निर्देशित करने से रोजगार सृजन में वृद्धि हो सकती है। सेवा क्षेत्र में, पर्यटन, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए नीतिगत सहायता से व्यापक स्तर पर समावेशी रोजगार सृजित किया जा सकता है।



