उत्तर प्रदेश

‘सुरक्षित परिवहन’ का दावा या बजटीय दिखावा?

400 करोड़ ई-बसों पर, लेकिन जर्जर बसों और दुर्घटनाओं पर खामोशी

लखनऊ | निश्चय टाइम्स डेस्क

प्रदेश के परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह ने भले ही 2026–27 के बजट को सुरक्षित, आधुनिक और पर्यावरण-अनुकूल परिवहन व्यवस्था की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया हो, लेकिन जमीनी सच्चाई इन दावों पर कई सवाल खड़े करती है।

सरकार ने ई-बसों की खरीद के लिए 400 करोड़ रुपये और बस अड्डों के निर्माण के लिए 150 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। सवाल यह है कि क्या यह राशि प्रदेश की विशाल आबादी और वर्षों से जर्जर होती परिवहन व्यवस्था के लिए पर्याप्त है? प्रदेश के कई जिलों में रोडवेज बसों की हालत खस्ता है, समयबद्धता का अभाव है और यात्रियों को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल पातीं। ऐसे में सीमित संख्या में ई-बसों की खरीद क्या केवल प्रतीकात्मक कदम तो नहीं?

“मुख्यमंत्री सड़क सुरक्षा विजन योजना” के तहत 50 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जबकि प्रदेश देश में सड़क दुर्घटनाओं के मामले में शीर्ष राज्यों में रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए व्यापक ढांचागत सुधार, ड्राइवर प्रशिक्षण और सख्त निगरानी की जरूरत है—सिर्फ बजटीय घोषणा से हालात नहीं बदलते।

इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए बस अड्डों पर चार्जिंग स्टेशनों हेतु 50 करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया गया है, लेकिन प्रदेश में अभी तक ई-वाहन इकोसिस्टम पर्याप्त विकसित नहीं हो पाया है। कई शहरों में पहले से स्थापित चार्जिंग स्टेशन भी पूर्ण क्षमता से संचालित नहीं हैं।

विपक्षी दलों और परिवहन विशेषज्ञों का मानना है कि बजट में घोषित योजनाएं सुनने में आकर्षक हैं, लेकिन इनके क्रियान्वयन की विश्वसनीयता पर सवाल बना हुआ है। पिछली योजनाओं का पूरा उपयोग न हो पाने और परियोजनाओं के अधूरे रहने का इतिहास भी सरकार के दावों पर संशय पैदा करता है।

सरकार का दावा है कि यह बजट परिवहन सेवाओं को तकनीक-सक्षम और पर्यावरण-अनुकूल बनाएगा, लेकिन आम यात्रियों की अपेक्षा है कि पहले मौजूदा समस्याओं—जर्जर बसें, अनियमित सेवाएं और बढ़ती दुर्घटनाएं—का ठोस समाधान सामने आए।

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