राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयान को विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों से व्यापक समर्थन मिल रहा है। उन्होंने कहा था कि कुछ लोग विवादित मुद्दों का इस्तेमाल कर ‘हिंदुओं के नेता’ बनने की कोशिश कर रहे हैं। उनके इस बयान ने समाज में सद्भावना का संदेश दिया है।
शिया पर्सनल लॉ बोर्ड का समर्थन
ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने भागवत के बयान का स्वागत करते हुए कहा कि मंदिर तलाशने के नाम पर विवाद खड़ा करना गलत है। उन्होंने कहा कि यह बयान देश में अच्छा माहौल पैदा करेगा और नेतागिरी चमकाने वालों पर लगाम लगाने की जरूरत है।
कांग्रेस और JMM नेताओं की प्रतिक्रिया
कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला ने भागवत के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि भाजपा और विश्व हिंदू परिषद को इस पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा, “जगह-जगह मंदिर और शिवलिंग तलाशना उचित नहीं है। यह समाज और देश सबका है। मंदिर के नाम पर दंगे-फसाद करना गलत है।”
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की सांसद महुआ माझी ने कहा कि भागवत का बयान सही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या उनके इस बयान के बाद ऐसी घटनाएं रुकेंगी।
समाजवादी पार्टी और अन्य दलों की राय
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता राम गोपाल यादव ने बयान का समर्थन करते हुए कटाक्ष किया कि “भागवत की बात को मानता कौन है?” वहीं, कांग्रेस सांसद विवेक तन्खा ने कहा कि “भागवत सही कह रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या उनकी बात भाजपा के लोग सुन रहे हैं?”
NDA के सहयोगी दल की प्रतिक्रिया
NDA की सहयोगी पार्टी आरएलएसपी के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद उपेन्द्र कुशवाहा ने भी भागवत का समर्थन करते हुए कहा कि समाज में तनाव पैदा करने वाले मुद्दों से बचा जाना चाहिए।
भागवत का बयान
भागवत ने पुणे में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था, “राम मंदिर निर्माण के बाद ऐसे विवादों को उठाना सही नहीं है। कुछ लोग सोचते हैं कि इस तरह वे ‘हिंदुओं के नेता’ बन जाएंगे।”
मोहन भागवत के इस बयान को समाज में सौहार्द बढ़ाने वाला कदम बताया जा रहा है। हालांकि, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस बयान का व्यावहारिक असर कितना होता है और क्या इससे राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के व्यवहार में बदलाव आएगा |
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