सरकारी स्कूलों की बंदी पर सियासत तेज, भाजपा पर शिक्षा विरोधी होने का आरोप
‘पीडीए पाठशाला’ आंदोलन को जनआंदोलन बनाने की तैयारी

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क (डी.एफ. हिंदी)
देश में सरकारी स्कूलों की बंदी को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है। भाजपा सरकार पर शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करने और सरकारी स्कूलों को बंद करने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आलोचकों का दावा है कि राज्यसभा में सरकार ने स्वीकार किया है कि पिछले पांच वर्षों में 18,727 सरकारी स्कूल बंद हुए हैं। इससे पहले उत्तर प्रदेश में स्कूलों के विलय के नाम पर हजारों विद्यालयों को बंद करने की कोशिश का भी मुद्दा उठ चुका है।
विपक्षी स्वर इसे गरीब, वंचित और पिछड़े वर्गों के बच्चों के भविष्य पर हमला बता रहे हैं। उनका कहना है कि सरकारी स्कूल बंद होने से सबसे अधिक असर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर पड़ेगा, जिनके लिए शिक्षा ही सामाजिक उन्नति का एकमात्र साधन है। मिड-डे मील जैसी योजनाओं से वंचित होने पर बच्चों के पोषण और मानसिक विकास पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
आरोप यह भी है कि शिक्षा के बजाए अन्य प्रशासनिक कार्यों में शिक्षकों की तैनाती से पढ़ाई प्रभावित हो रही है, जिससे शिक्षक-छात्र संबंध और शैक्षिक वातावरण कमजोर हो रहा है। विरोधी दलों का मानना है कि यदि सरकारी शिक्षा प्रणाली कमजोर हुई तो निजी स्कूलों की फीस और संबंधित खर्च गरीब परिवारों के लिए असहनीय हो जाएंगे।
इसी संदर्भ में ‘पीडीए पाठशाला’ जैसे सांकेतिक आंदोलनों को व्यापक जनआंदोलन का रूप देने की बात कही जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी चुनावों में शिक्षा एक प्रमुख मुद्दा बन सकता है, विशेषकर महिलाओं और अभिभावकों के बीच।



