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क्रॉस-बॉर्डर ट्रेड के नाम पर यूरोपीय मानकों की चुपचाप एंट्री?

डिजिटल सुविधा या डेटा संप्रभुता से समझौता? भारत-EU ई-सिग्नेचर समझौते पर उठे सवाल

निश्चयट टाइम्स डेस्क। भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और यूरोपीय आयोग के DG CONNECT के बीच एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर और सील्स को लेकर हुए प्रशासनिक समझौते को डिजिटल सहयोग की बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है, लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर विशेषज्ञों और उद्योग जगत में कई गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

सरकार का दावा है कि इस समझौते से भारत-यूरोपीय संघ के बीच क्रॉस-बॉर्डर डिजिटल व्यापार आसान होगा, लेकिन डेटा संप्रभुता, कानूनी नियंत्रण और घरेलू डिजिटल इकोसिस्टम की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर कोई स्पष्टता सामने नहीं आई है। आलोचकों का कहना है कि यह समझौता कहीं न कहीं यूरोपीय संघ के डिजिटल मानकों को भारतीय प्रणाली में प्रवेश देने का रास्ता खोल सकता है।

इस व्यवस्था के तहत भारत और यूरोपीय संघ की “ट्रस्टेड लिस्ट” को आपस में जोड़ने की योजना है, जिससे दोनों पक्षों के इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर और सील्स को मान्यता मिलेगी। हालांकि, जानकारों का मानना है कि भारतीय एमएसएमई और स्टार्ट-अप्स अभी तक एडवांस्ड डिजिटल सिग्नेचर इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं। ऐसे में यह सुविधा बड़े निर्यातकों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों तक सीमित रहने की आशंका है।

डिजिटल दस्तावेजों के त्वरित सत्यापन और कागजरहित व्यापार की बात तो की जा रही है, लेकिन साइबर सुरक्षा जोखिम, डेटा स्टोरेज का स्थान, और कानूनी विवाद की स्थिति में अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) जैसे संवेदनशील पहलुओं पर सरकार की ओर से कोई ठोस रोडमैप सामने नहीं आया है। यूरोपीय संघ का डेटा संरक्षण कानून (GDPR) अत्यंत सख्त है, जबकि भारत का डेटा संरक्षण ढांचा अभी संक्रमण काल में है—ऐसे में असंतुलन की स्थिति बन सकती है।

विशेषज्ञ यह भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या भारतीय डिजिटल सर्टिफिकेशन प्राधिकरणों की भूमिका इस सहयोग में बराबरी की रहेगी या वे केवल यूरोपीय मानकों के अनुरूप ढलने को मजबूर होंगे। इससे घरेलू डिजिटल सिग्नेचर उद्योग की स्वायत्तता प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।

कुल मिलाकर, भारत-EU ई-सिग्नेचर समझौता कागजों पर डिजिटल व्यापार को तेज करने का वादा करता है, लेकिन नीतिगत स्पष्टता, डेटा सुरक्षा और समान अवसर के बिना यह सहयोग भविष्य में भारत के लिए रणनीतिक चुनौती भी बन सकता है।

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