क्राइम

तनाव में ड्यूटी, इलाज बाद में—पुलिस कर्मियों की मानसिक स्थिति पर फिर उठे सवाल

35,000 से ज्यादा पुलिसकर्मी प्रभावित, आयुर्वेद प्रोजेक्ट बना सहारा—लेकिन सिस्टम पर दबाव बरकरार

निश्चय टाइम्स न्यूज नेटवर्क
देश की कानून व्यवस्था संभालने वाले पुलिसकर्मी खुद मानसिक दबाव के बोझ तले दबे हुए हैं। अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIA) की एक जन स्वास्थ्य परियोजना ने इस गंभीर हकीकत को उजागर कर दिया है। परियोजना के तहत अब तक 35,704 पुलिसकर्मियों को तनाव प्रबंधन के प्रति जागरूक किया गया है—जो यह संकेत देता है कि समस्या कितनी व्यापक है।

महामारी के दौरान शुरू हुई इस पहल का उद्देश्य आयुर्वेद के माध्यम से तनाव से निपटना था, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि पुलिस बल में मानसिक स्वास्थ्य एक गहरी चुनौती बन चुका है। परियोजना के तहत 206 शिविर आयोजित किए गए, जिनमें 7,752 कर्मियों की जांच की गई और 1,843 को उपचार की आवश्यकता पड़ी।

प्रो. प्रदीप कुमार प्रजापति ने मानसिक स्वास्थ्य को समाज के प्रभावी संचालन की नींव बताया, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल जागरूकता और सीमित उपचार इस बड़ी समस्या का समाधान है?

परियोजना का नेतृत्व डॉ. मेधा कुलकर्णी और डॉ. मीना देवगड़े द्वारा किया गया, जिसमें एक मोबाइल एप और आयुर्वेदिक उपचार जैसे शिरोधारा शामिल हैं। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि यह पहल सराहनीय है, लेकिन यह समस्या की जड़—लंबी ड्यूटी, तनावपूर्ण माहौल और संसाधनों की कमी—को पूरी तरह संबोधित नहीं करती।

अतुल कटियार ने आयुर्वेद की भूमिका की सराहना की, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि पुलिसकर्मी लगातार मानसिक और शारीरिक दबाव में काम कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक कार्य स्थितियों में सुधार, पर्याप्त स्टाफिंग और मनोवैज्ञानिक सहायता की व्यापक व्यवस्था नहीं होगी, तब तक ऐसी परियोजनाएं केवल आंशिक राहत ही दे पाएंगी।

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