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ग्रीन टैग के नाम पर ट्रेडिंग—क्या प्रदूषण पर लगेगा ब्रेक या बनेगा बाजार?

कार्बन क्रेडिट योजना: पर्यावरण या उद्योगों के लिए नया मुनाफा मॉडल?

निश्चयट टाइम्स डेस्क।
सरकार ने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को नियंत्रित करने के उद्देश्य से कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना को लागू करने की दिशा में कदम तेज कर दिए हैं, लेकिन इस महत्वाकांक्षी पहल ने कई गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर शुरू किए जा रहे इस “कार्बन बाजार” को लेकर विशेषज्ञों का एक वर्ग इसे प्रदूषण कम करने से ज्यादा “उत्सर्जन का व्यापार” बनाने की आशंका जता रहा है।

योजना के तहत भारतीय कार्बन बाजार (ICM) में ऊर्जा-गहन सात क्षेत्रों के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता लक्ष्य तय किए गए हैं। जो कंपनियां इन लक्ष्यों से बेहतर प्रदर्शन करेंगी, उन्हें कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र दिए जाएंगे, जिनका बिजली एक्सचेंजों के माध्यम से व्यापार किया जा सकेगा। सवाल यह उठ रहा है कि क्या इससे कंपनियों को प्रदूषण कम करने की वास्तविक प्रेरणा मिलेगी, या फिर बड़े उद्योग क्रेडिट खरीदकर उत्सर्जन जारी रखेंगे?

आलोचकों का मानना है कि कार्बन क्रेडिट सिस्टम अक्सर “पोल्यूट एंड पे” मॉडल में बदल जाता है—जहां प्रदूषण रोकने के बजाय उसे संतुलित करने के लिए बाजार आधारित विकल्प अपनाए जाते हैं। इससे पर्यावरणीय जिम्मेदारी का बोझ कम करने के बजाय वित्तीय लेन-देन का रास्ता खुल सकता है।

सरकार ने निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन के लिए ढांचा तैयार करने और कार्बन सत्यापन एजेंसियों के प्रत्यायन की प्रक्रिया स्थापित करने का दावा किया है, लेकिन भारत जैसे विशाल और विविध औद्योगिक ढांचे में इन मानकों का सख्ती से पालन कराना बड़ी चुनौती माना जा रहा है। यदि निगरानी कमजोर रही, तो यह योजना केवल कागजी उपलब्धि बनकर रह सकती है।

योजना के कार्यान्वयन के लिए ऊर्जा दक्षता ब्यूरो संस्थाओं से शुल्क और प्रभार एकत्र करेगा, जबकि केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग व्यापारिक गतिविधियों को नियामक सहायता देगा। हालांकि, यह भी चिंता है कि कहीं यह अतिरिक्त वित्तीय बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर न डाल दिया जाए।

संस्थागत व्यवस्था के तहत विद्युत मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालय के सचिवों की सह-अध्यक्षता में राष्ट्रीय संचालन समिति बनाई गई है, लेकिन विशेषज्ञ पूछ रहे हैं—क्या केवल समितियां बना देने से उत्सर्जन कम हो जाएगा? या फिर यह एक और जटिल नियामकीय ढांचा बनकर रह जाएगा, जिसमें जवाबदेही तय करना मुश्किल होगा।

कुल मिलाकर, कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम बताई जा रही है, लेकिन इसकी सफलता पारदर्शिता, सख्त निगरानी और वास्तविक उत्सर्जन कटौती पर निर्भर करेगी। अन्यथा, यह पहल जलवायु संकट से लड़ने का समाधान कम और एक नया वित्तीय बाजार ज्यादा साबित हो सकती है।

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