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ओटीसी डेरिवेटिव बाजार में बड़ा बदलाव

ओटीसी डेरिवेटिव बाजार में बड़ा बदलाव

1 अप्रैल 2026 से यूटीआई अनिवार्य, पारदर्शिता और निगरानी होगी मजबूत

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क।

भारतीय वित्तीय बाजार में पारदर्शिता और जोखिम प्रबंधन को नई मजबूती देने की दिशा में भारतीय रिज़र्व बैंक ने अहम कदम उठाया है। आरबीआई के वित्तीय बाजार विनियमन विभाग द्वारा जारी मसौदा परिपत्र के अनुसार, भारत में ओवर-द-काउंटर (ओटीसी) डेरिवेटिव लेनदेन के लिए “विशिष्ट लेनदेन अभिज्ञापक” (यूटीआई) को अनिवार्य रूप से लागू किया जाएगा। यह व्यवस्था 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी होगी।

यूटीआई को वैश्विक स्तर पर ओटीसी डेरिवेटिव लेनदेन की रिपोर्टिंग के लिए एक महत्वपूर्ण डेटा तत्व माना जाता है। इसके माध्यम से प्रत्येक लेनदेन को एक अलग और विशिष्ट पहचान संख्या दी जाएगी, जिससे नियामकों को पूरे बाजार की व्यापक और सटीक निगरानी करने में सहायता मिलेगी। आरबीआई का मानना है कि इससे वित्तीय प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ेगी और संभावित प्रणालीगत जोखिमों की समय रहते पहचान संभव हो सकेगी।

किन-किन लेनदेन पर होगा लागू

यह अनिवार्यता रुपया ब्याज दर डेरिवेटिव, सरकारी प्रतिभूतियों में वायदा संविदा, विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव, विदेशी मुद्रा ब्याज दर डेरिवेटिव तथा ऋण डेरिवेटिव सहित सभी ओटीसी लेनदेन पर लागू होगी। आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि यह निर्देश भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45यू और 45डब्ल्यू के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए जारी किए गए हैं।

यूटीआई का सृजन भुगतान और बाजार अवसंरचना समिति (सीपीएमआई) तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतिभूति आयोग संगठन (आईओएससीओ) द्वारा फरवरी 2017 में जारी तकनीकी मार्गदर्शन के अनुरूप किया जाएगा। प्रत्येक यूटीआई अधिकतम 52 अक्षरों का होगा, जिसमें सृजनकर्ता इकाई का लीगल एंटिटी आइडेंटिफायर (एलईआई) और उसके बाद एक विशिष्ट कोड शामिल होगा। यह कोड पूरे संविदा जीवनचक्र के दौरान वैध रहेगा।

‘वाटरफॉल’ प्रणाली से तय होगी जिम्मेदारी

आरबीआई ने यूटीआई सृजन के लिए स्पष्ट ‘वाटरफॉल’ व्यवस्था निर्धारित की है। केवल भारत में रिपोर्ट होने वाले लेनदेन के लिए, जहां केंद्रीय प्रतिपक्षकार (सीसीपी) शामिल है, वही यूटीआई बनाएगा। यदि लेनदेन इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म (ईटीपी) पर निष्पादित हुआ है तो ईटीपी इसकी जिम्मेदारी निभाएगा। अन्य मामलों में क्लियरिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड – ट्रेड रिपॉजिटरी (सीसीआईएल-टीआर) यूटीआई सृजित करेगा।

वहीं, यदि लेनदेन भारत और किसी विदेशी क्षेत्राधिकार में रिपोर्ट करने योग्य है, तो विदेशी क्षेत्राधिकार की रिपोर्टिंग समय-सीमा के अनुसार यूटीआई सृजनकर्ता तय होगा। यदि समय-सीमा स्पष्ट नहीं है तो दोनों पक्ष आपसी सहमति से जिम्मेदारी तय करेंगे, अन्यथा अंतिम जिम्मेदारी सीसीआईएल-टीआर पर होगी।

रिपोर्टिंग प्रक्रिया में नहीं होगा बदलाव

आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि यूटीआई लागू होने से मौजूदा रिपोर्टिंग दायित्वों में कोई बदलाव नहीं होगा। बाजार प्रतिभागियों को पहले की तरह लेनदेन रिपोर्ट करना होगा, हालांकि संशोधित रिपोर्टिंग प्रारूप और परिचालन दिशानिर्देश अलग से जारी किए जाएंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारतीय डेरिवेटिव बाजार को वैश्विक मानकों के अनुरूप लाने की दिशा में निर्णायक साबित होगा। इससे लेनदेन की ट्रैकिंग आसान होगी, डेटा की गुणवत्ता सुधरेगी और नियामकीय निगरानी अधिक प्रभावी बनेगी।

आरबीआई ने सभी बाजार सहभागियों को निर्देश दिया है कि वे समय रहते आवश्यक तकनीकी और अनुपालन व्यवस्था सुनिश्चित कर लें, ताकि 1 अप्रैल 2026 से इस नई प्रणाली का सुचारु क्रियान्वयन हो सके।


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