राष्ट्रीय

दुनिया की पहली हवाई डाक सेवा के 115 वर्ष

प्रयाग कुंभ से उड़ी थी इतिहास की पहली डाक उड़ान

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क।

दुनिया की पहली आधिकारिक हवाई डाक सेवा ने 18 फरवरी 2026 को अपने 115 वर्ष पूरे कर लिए। यह ऐतिहासिक सेवा 18 फरवरी 1911 को प्रयागराज में कुंभ मेले के दौरान शुरू हुई थी। पोस्टमास्टर जनरल सुनील कुमार राय पोस्टमास्टर जनरल मुख्यालय परिक्षेत्र लखनऊ ने बताया कि यह केवल डाक सेवा की शुरुआत नहीं थी, बल्कि आधुनिक वैश्विक संचार क्रांति का शंखनाद भी था।

6,500 पत्रों के साथ भरी थी ऐतिहासिक उड़ान

उस दिन फ्रांसीसी पायलट मोनसियर हेनरी पिक्वेट ने हैवीलैंड विमान से प्रयागराज से नैनी तक 6,500 पत्रों को लेकर उड़ान भरी थी। यह दूरी लगभग 6 मील (करीब 10-15 किलोमीटर) की थी, जिसे मात्र 13 मिनट में पूरा किया गया। शाम साढ़े पांच बजे यमुना किनारे से विमान ने उड़ान भरी और नैनी जंक्शन के पास सेंट्रल जेल के निकट सुरक्षित उतरा।

उस समय प्रयागराज में कृषि एवं व्यापार प्रदर्शनी ‘यूपी एक्जीबिशन’ लगी थी, जहां इस उड़ान का प्रदर्शन किया गया। विमान के पुर्जों को सार्वजनिक रूप से जोड़ा गया था, क्योंकि उस दौर में विमान देखना भी लोगों के लिए कौतूहल का विषय था। उड़ान देखने के लिए लगभग एक लाख लोग एकत्र हुए थे।

कुंभ की आस्था और तकनीक का संगम

संयोग से उस वर्ष प्रयाग कुंभ भी चल रहा था। हेनरी पिक्वेट ने न केवल डाक इतिहास रचा, बल्कि आसमान से दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक मेले का दुर्लभ दृश्य भी देखा। ब्रिटिश एवं कालोनियल एयरोप्लेन कंपनी ने जनवरी 1911 में प्रदर्शन हेतु विमान भारत भेजा था, और कर्नल वाई. विंधाम के सुझाव पर डाक विभाग ने मेल बैग हवाई मार्ग से भेजने की अनुमति दी।

मेल बैग पर ‘पहली हवाई डाक’ और ‘उत्तर प्रदेश प्रदर्शनी, इलाहाबाद’ अंकित था। खास बात यह रही कि पारंपरिक काली स्याही की जगह मैजेंटा स्याही का प्रयोग किया गया। वजन की सख्त सीमा के चलते सावधानीपूर्वक गणना के बाद केवल 6,500 पत्रों को उड़ान की अनुमति मिली।

छह आना शुल्क, दान में गई आय

इस ऐतिहासिक सेवा के लिए छह आना विशेष शुल्क रखा गया था। इससे हुई आय को ऑक्सफोर्ड एंड कैंब्रिज हॉस्टल, इलाहाबाद को दान में दिया गया। 18 फरवरी को दोपहर तक पत्रों की बुकिंग की गई और हॉस्टल परिसर मिनी जीपीओ जैसा नजर आने लगा। कुछ ही दिनों में 3,000 से अधिक पत्र जमा हो गए। एक पत्र पर 25 रुपये का डाक टिकट भी लगाया गया था। पत्र भेजने वालों में स्थानीय प्रतिष्ठित नागरिकों के साथ राजा-महाराजा और राजकुमार भी शामिल थे।

डाक से डिजिटल युग तक

सुनील कुमार राय पोस्टमास्टर जनरल मुख्यालय परिक्षेत्र लखनऊ, जिन्होंने ‘इंडिया पोस्ट : 150 ग्लोरियस ईयर्स’ पुस्तक लिखी है, के अनुसार यह घटना वैश्विक संचार के इतिहास में मील का पत्थर है। आज भले ही डिजिटल संचार का दौर हो, पर पत्रों की आत्मीयता और ऐतिहासिक महत्ता अलग ही स्थान रखती है।

हवाई डाक सेवा ने न केवल पत्रों को पंख दिए, बल्कि सपनों और विचारों को भी सीमाओं के पार पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त किया। प्रयागराज और कुंभ से जुड़ी यह विरासत आज भी भारत के गौरवशाली डाक इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है।


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