क्रेडिट रिस्क नियमों में ऐतिहासिक बदलाव, 2027 से लागू होगा नया फ्रेमवर्क
बैंकों के लिए सख्त कैपिटल नियम तय—MSME, रियल एस्टेट और रिटेल लोन पर नई गणना व्यवस्था

(निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क)
भारत की केंद्रीय बैंक Reserve Bank of India (RBI) ने बैंकिंग सेक्टर में जोखिम प्रबंधन को मजबूत करने के लिए “कैपिटल चार्ज फॉर क्रेडिट रिस्क – स्टैंडर्डाइज्ड अप्रोच” से जुड़े ड्राफ्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। यह पहल वैश्विक बैंकिंग सुधारों के तहत Basel Committee on Banking Supervision (BCBS) के “Basel III” फ्रेमवर्क के अनुरूप है, जिसे भारतीय परिस्थितियों के अनुसार ढाला गया है।
RBI के इस प्रस्तावित ढांचे का मुख्य उद्देश्य बैंकों द्वारा जोखिम-भारित परिसंपत्तियों (Risk Weighted Assets) की गणना को अधिक सटीक, पारदर्शी और तुलनात्मक बनाना है। इसके तहत बैंकों को अब क्रेडिट रिस्क की गणना के लिए स्टैंडर्डाइज्ड अप्रोच (SA) अपनाना होगा, जिससे पूंजी पर्याप्तता अनुपात (Capital Adequacy Ratio) का निर्धारण अधिक विश्वसनीय तरीके से किया जा सकेगा।
ड्राफ्ट में साफ किया गया है कि यह नियम 1 अप्रैल 2027 से लागू होंगे और यह सभी शेड्यूल्ड कमर्शियल बैंकों पर लागू होंगे, हालांकि स्मॉल फाइनेंस बैंक, पेमेंट बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक इससे बाहर रखे गए हैं। RBI ने यह कदम बैंकिंग प्रणाली को वैश्विक मानकों के अनुरूप लाने और निवेशकों व जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा के लिए उठाया है।
इस फ्रेमवर्क में विभिन्न प्रकार के एक्सपोजर के लिए अलग-अलग जोखिम भार निर्धारित किए गए हैं। इसमें घरेलू और विदेशी संप्रभु संस्थाएं, पब्लिक सेक्टर एंटिटीज, बैंक, कॉरपोरेट, MSME, रियल एस्टेट, रिटेल लोन और नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPA) जैसी श्रेणियां शामिल हैं। MSME और रियल एस्टेट सेक्टर को विशेष महत्व देते हुए इनके लिए अधिक परिष्कृत जोखिम आकलन का प्रावधान किया गया है।
ड्राफ्ट में “ट्रांजैक्टर्स” की नई परिभाषा भी दी गई है, जिसमें ऐसे क्रेडिट कार्ड उपयोगकर्ताओं को शामिल किया गया है जो पिछले 12 महीनों में समय पर पूरा भुगतान करते रहे हैं। इससे जिम्मेदार ग्राहकों को बेहतर श्रेणी में रखा जाएगा और बैंकों के लिए जोखिम कम माना जाएगा।
इसके अलावा ऑफ-बैलेंस शीट आइटम, सिक्योरिटाइजेशन एक्सपोजर और अनहेज्ड विदेशी मुद्रा जोखिम जैसे जटिल वित्तीय पहलुओं को भी नए नियमों के तहत शामिल किया गया है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की भूमिका को भी स्पष्ट किया गया है, जिसमें उनकी रेटिंग के आधार पर जोखिम भार तय करने के लिए सख्त मापदंड निर्धारित किए गए हैं।
क्रेडिट रिस्क मिटिगेशन के तहत गारंटी, कोलैटरल और नेटिंग जैसे उपायों के लिए भी विस्तृत दिशा-निर्देश दिए गए हैं, जिससे बैंकों को जोखिम कम करने के लिए बेहतर उपकरण मिलेंगे।



