हेल्थ

8 घंटे में 350 इंटरव्यू: पारदर्शिता पर फिर खड़े हुए सवाल

EWS के नाम पर सामान्य सीटों पर ‘कैंची’?

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क |

हेल्थ एवं वेलनेस सेंटरों के लिए संविदा पर 55 एमबीबीएस डॉक्टरों की भर्ती को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। निश्चय टाइम्स ने पहले भी सवाल उठाया था कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के नाम पर क्या सामान्य सीटों का कोटा कम किया गया? इस मुद्दे पर जब उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक से पूछा गया तो उन्होंने शिकायत मिलने पर कार्रवाई की बात कहकर जवाब टाल दिया था। अब एक बार फिर अभ्यर्थियों ने चयन प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

मामला मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय लखनऊ के अधीन हुई भर्ती का है। 7 जनवरी को आयोजित वॉक-इन इंटरव्यू में 55 पदों के लिए करीब 350 उम्मीदवार शामिल हुए। इंटरव्यू सुबह 11 बजे से शाम 7 बजे तक चले। यानी कुल 8 घंटे—480 मिनट। गणना के मुताबिक प्रति अभ्यर्थी औसतन सिर्फ 1 मिनट 37 सेकंड का समय मिला।

सीधा सवाल उठता है—क्या डेढ़ मिनट में किसी डॉक्टर की योग्यता का आकलन संभव है? या फिर इंटरव्यू महज औपचारिकता था?

अभ्यर्थियों का आरोप है कि कई उम्मीदवारों को एक-दो सवाल पूछकर बाहर कर दिया गया। बुलाने और कुर्सी तक बैठाने में ही 30–40 सेकंड लग जाते थे। ऐसे में वास्तविक इंटरव्यू समय और भी कम रह जाता है। कुछ उम्मीदवारों का दावा है कि चयन सूची पहले से तय थी और प्रक्रिया सिर्फ दिखावे के लिए की गई।

विवाद का दूसरा बड़ा बिंदु EWS कोटा है। आरोप है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के नाम पर सामान्य वर्ग की सीटों को प्रभावित किया गया। क्या EWS प्रमाणपत्रों की समुचित जांच हुई? क्या जिला स्तरीय सत्यापन किया गया? क्या चयनित अभ्यर्थियों की मेरिट और श्रेणी सार्वजनिक की जाएगी? इन सवालों का स्पष्ट जवाब अब तक सामने नहीं आया है।

सबसे अहम बात—क्या पूरी इंटरव्यू प्रक्रिया की वीडियोग्राफी हुई? यदि हां, तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा? अगर सब पारदर्शी था तो मेरिट लिस्ट सार्वजनिक करने में हिचक क्यों?

स्वास्थ्य विभाग की साख दांव पर है। यह सिर्फ 55 डॉक्टरों की नौकरी का सवाल नहीं है, बल्कि सरकारी भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता और जनता के भरोसे का मामला है। हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर जैसे संवेदनशील संस्थानों में नियुक्ति यदि विवादों में घिरती है, तो इसका असर सीधे आम जनता की स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ता है।

अभ्यर्थियों की मांग है कि पूरी चयन प्रक्रिया की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए, मेरिट सूची सार्वजनिक की जाए और यदि किसी स्तर पर अनियमितता पाई जाए तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई हो। फिलहाल, जवाबों से ज्यादा सवाल हैं—और ये सवाल तब तक उठते रहेंगे, जब तक पारदर्शिता पूरी तरह सामने नहीं आती।

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