केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री और संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने हाल ही में एक कार्यक्रम में राजनीति में आए बदलावों को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब हालात ऐसे हो गए हैं कि अच्छे काम करने पर भी वोट नहीं मिलते। यह बयान राजनीति में गिरते स्तर और बदलते माहौल पर उनके गहरे विचारों को दर्शाता है।
राजनीति में बदलाव और वोटों की चिंता
रिजिजू ने कहा कि मौजूदा राजनीति में स्थिति इतनी बदल चुकी है कि सिर्फ अच्छे काम से वोट हासिल करना मुश्किल हो गया है। उन्होंने कहा, “पहले, संसद में अच्छी चर्चा होती थी, लेकिन अब सदन में केवल शोरगुल होता है। लोगों की मानसिकता में भी बदलाव आया है, और ऐसे बहुत कम लोग बचे हैं जो अच्छे काम की सराहना करते हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि अब अच्छा बोलने पर भी कोई ध्यान नहीं देता, जिससे राजनीतिक संवाद की गुणवत्ता पर असर पड़ा है। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि इस बार के चुनाव में वह नामांकन भरने के बाद प्रचार में भी नहीं गए थे और मतगणना में भी शामिल नहीं हुए थे, यह देखने के लिए कि लोग उनके बिना कैसे प्रतिक्रिया देंगे।
भाजपा और हालिया चुनाव परिणाम
भाजपा के लिए यह बयान एक ऐसे समय में आया है जब पार्टी लगातार तीसरी बार सत्ता में तो है, लेकिन हालिया लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत नहीं मिला। पार्टी ने 400 सीटों से अधिक का दावा किया था, लेकिन परिणाम अपेक्षा से कम आए, जिसके कारण गठबंधन सरकार बनानी पड़ी। रिजिजू का यह बयान संभवतः पार्टी के भीतर इस असंतोष को भी दर्शाता है कि अच्छे काम करने के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं।
सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर टिप्पणी
रिजिजू ने सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के बिगड़ते हालात पर भी गहरी चिंता जताई। राष्ट्रीय सेवा भारती और संत ईश्वर फाउंडेशन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा, “सामाजिक व्यवस्था बहुत बिगड़ चुकी है, राजनीतिक दृष्टि से भी। जब हम युवा सांसद थे, तब संसद में बहुत बढ़िया चर्चा होती थी।” उनके अनुसार, राजनीति का यह बदलाव विचारशील संवाद और अच्छे कामों की सराहना की संस्कृति को कमजोर कर रहा है।
आगे की राह
रिजिजू का यह बयान इस बात का संकेत है कि भारतीय राजनीति में बदलावों ने न सिर्फ नेताओं बल्कि जनता की सोच को भी प्रभावित किया है। अच्छे काम के बावजूद वोट न मिलने की उनकी शिकायत केवल एक नेता की व्यक्तिगत चिंता नहीं है, बल्कि यह वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर व्यापक सवाल खड़े करती है।