अर्बन चैलेंज फंड पर बड़े दावे, ज़मीनी हकीकत पर उठे सवाल
PPP मॉडल और कर्ज निर्भरता से बढ़ेगा बोझ? राज्यों पर तेज़ क्रियान्वयन का दबाव

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क
शहरी विकास को रफ्तार देने के बड़े दावों के बीच अर्बन चैलेंज फंड (UCF) को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। केंद्रीय मंत्री Manohar Lal Khattar की अध्यक्षता में हुई बैठक में जहां 1 लाख करोड़ रुपये की सहायता का ऐलान किया गया, वहीं इस योजना के क्रियान्वयन को लेकर राज्यों पर बढ़ता दबाव भी साफ नजर आया।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस फंड के तहत केवल उन्हीं परियोजनाओं को प्राथमिकता मिलेगी, जो अपनी लागत का कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सा बाजार से—जैसे बैंक लोन या PPP मॉडल—के जरिए जुटा सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि यह शर्त नगर निकायों और राज्य सरकारों को कर्ज के जाल में धकेल सकती है, जिससे भविष्य में वित्तीय दबाव और बढ़ सकता है।
बैठक में राज्यों को जल्द से जल्द लंबित प्रक्रियाएं पूरी करने और समयबद्ध क्रियान्वयन के निर्देश दिए गए। लेकिन जमीनी स्तर पर पहले से ही कई शहरी परियोजनाएं धीमी गति, फंड की कमी और प्रशासनिक अड़चनों का सामना कर रही हैं। ऐसे में इतनी बड़ी योजना को तेजी से लागू करना एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
A. K. Sharma ने इस योजना को शहरी विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया, लेकिन यह भी साफ है कि राज्यों को संसाधन जुटाने और परियोजनाओं की पहचान करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। खासकर छोटे और मध्यम शहरों के लिए PPP मॉडल अपनाना आसान नहीं होगा।
“Cities as Growth Hubs” और “Creative Redevelopment” जैसे आकर्षक नारों के पीछे यह चिंता भी है कि कहीं यह योजना केवल बड़े शहरों तक सीमित न रह जाए और छोटे नगर फिर से उपेक्षित न रह जाएं।
कुल मिलाकर, अर्बन चैलेंज फंड एक महत्वाकांक्षी योजना जरूर है, लेकिन इसके साथ जुड़े आर्थिक जोखिम, क्रियान्वयन की चुनौतियां और राज्यों पर बढ़ता दबाव इसे विवादों के घेरे में ला सकता है।



