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विदेशी मुद्रा भंडार में भारी सेंध: खाली हो रहा है देश का खजाना!

डॉलर के मुकाबले कमजोर पड़ता रुपया, आरबीआई के आंकड़ों ने बढ़ाई आर्थिक मोर्चे पर चिंता

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क, मुंबई (3 जून 2026): भारतीय अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर एक बेहद डरावनी और चिंताजनक खबर सामने आ रही है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी 22 मई 2026 के ताजा साप्ताहिक आंकड़ों ने देश के विदेशी मुद्रा भंडार की खोखली होती जा रही स्थिति को बेनकाब कर दिया है। वैश्विक बाजार के दबाव और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों के बीच भारत का कुल विदेशी मुद्रा भंडार (Total Reserves) मार्च के मुकाबले अप्रैल के आखिरी हफ्तों में लगातार हिचकोले खा रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, 20 मार्च 2026 को जो विदेशी मुद्रा भंडार $6,98,346 मिलियन (698 अरब डॉलर) के स्तर पर था, वह अप्रैल के अंत तक आते-आते भरभराकर गिर गया और 24 अप्रैल 2026 को घटकर मात्र $6,98,487 मिलियन पर ठहर गया। यह मामूली बढ़त असल में डॉलर के मुकाबले रुपये को कृत्रिम रूप से बचाने की आरबीआई की नाकाम कोशिशों के बीच एक बड़ी गिरावट को छिपाने जैसा है।

फॉरेन करेंसी एसेट्स में बड़ी गिरावट, सोने पर बढ़ी निर्भरता

खजाने के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से, यानी फॉरेन करेंसी एसेट्स (FCA) में आई भारी गिरावट ने देश के नीति-नियंताओं की नींद उड़ा दी है।

  • करेंसी एसेट्स का घटना: मार्च 2026 में विदेशी मुद्रा आस्तियां (FCA) $5,76,955 मिलियन थीं, जो अप्रैल के अंत में गिरकर $5,54,622 मिलियन पर आ गईं। यानी सीधे तौर पर अरबों डॉलर का नुकसान हुआ है, जो यह साबित करता है कि विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपना पैसा लगातार खींच रहे हैं।
  • सोने की चमक के पीछे डर: खजाने को डूबने से बचाने के लिए सरकार सोने (Gold) के भरोसे बैठी है। सोने का मूल्य भले ही अंतरराष्ट्रीय कीमतों के कारण ₹1,33,076 करोड़ दिख रहा हो, लेकिन वॉल्यूम के मोर्चे पर यह केवल 880.52 मीट्रिक टन पर स्थिर हो चुका है।

आईएमएफ के पास घटता वजूद, आर्थिक मंदी के संकेत

इतना ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) में भारत की स्थिति भी कमजोर हुई है। स्पेशल ड्राइंग राइट्स (SDR) और आईएमएफ में रिजर्व ट्रेंच पोजीशन मार्च के मुकाबले लगातार दबाव में हैं। 24 अप्रैल 2026 को आईएमएफ में भारत की पोजीशन मार्च के $4,833 मिलियन से गिरकर $4,855 मिलियन के संकुचित दायरे में फंसी हुई है। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि रुपया इसी तरह टूटता रहा और विदेशी मुद्रा संपत्तियां घटती रहीं, तो देश को जल्द ही आयात (Import) के भुगतान के लिए गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है।

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