मुख्यमंत्री आयुष सुधार में जुटे, यूनानी विभाग में ‘क्लर्क राज’ के आरोप
योगी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति पर सवाल, इकबाल अहमद सिद्दीकी पर विभाग नियंत्रित करने के आरोप

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क
उत्तर प्रदेश को वैश्विक स्तर पर एक प्रमुख वेलनेस डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित करने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जहां दिन-रात प्रयासरत हैं, वहीं उनके ही मातहत आने वाले आयुष विभाग का एक हिस्सा सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहा है। हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सरकारी आवास पर आयुष विभाग के कार्यों की उच्चस्तरीय समीक्षा की और प्रदेश में ‘आयुष हेल्थ एण्ड वेलनेस नीति-2026’ को प्रभावी ढंग से लागू करने के कड़े निर्देश दिए। लेकिन विडंबना देखिए कि जहां मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश की आध्यात्मिक-सांस्कृतिक विरासत और आयुष सेक्टर को जोड़कर रोजगार व निवेश बढ़ाने का खाका खींच रहे हैं, वहीं यूनानी विभाग के भीतर सालों से जमा भ्रष्टाचार का दीमक सरकार की इन तमाम उपलब्धियों को धूमिल करने में लगा है।सीएम की बड़ी योजनाएं और जमीनी हकीकत का विरोधाभास

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का विजन उत्तर प्रदेश को केवल उपचार आधारित व्यवस्था तक सीमित रखना नहीं है। वह वाराणसी, अयोध्या और मथुरा जैसे धार्मिक सर्किटों को आयुष वेलनेस सेक्टर से जोड़कर एक अभूतपूर्व हीलिंग हब बनाना चाहते हैं। बैठक में पीपीपी मॉडल के जरिए आधुनिक आयुष वेलनेस सेंटर और 100 शैय्या वाले एकीकृत चिकित्सालय स्थापित करने की चरणबद्ध कार्ययोजना पर मुहर लगी है। निवेश आकर्षित करने के लिए सिंगल विंडो सिस्टम और स्टाम्प ड्यूटी में छूट जैसे लुभावने प्राविधान किए गए हैं।
परंतु, इस भव्य और जनहितैषी विजन के समानांतर यूनानी विभाग की काली हकीकत सरकार के इरादों को पलीता लगा रही है। यूनानी विभाग के महानिदेशालय और अधिकारियों की नाक के नीचे चल रहा खेल यह साबित करता है कि मुख्यमंत्री की सख्ती के बावजूद निचले स्तर पर ‘मठाधीशी’ कायम है।
क्लर्क इकबाल अहमद सिद्दीकी की ‘मठाधीशी’ के आगे विभाग लाचार!
यूनानी विभाग में फैले इस संस्थागत भ्रष्टाचार के केंद्र में यूनानी बोर्ड के सदस्य डॉ. शकील अहमद के हालिया खुलासे ने हड़कंप मचा दिया है। विभाग की सबसे बड़ी विफलता और मनमानी का चेहरा बनकर उभरा है—क्लर्क इकबाल अहमद सिद्दीकी (मोहम्मद इकबाल)। आरोप है कि उत्तर प्रदेश सरकार की पारदर्शी स्थानांतरण (ट्रांसफर) नीति को पूरी तरह ठेंगा दिखाते हुए यह क्लर्क पिछले 30 वर्षों से एक ही सीट पर जमा बैठा है।
विभाग के गलियारों में चर्चा है कि ट्रांसफर पॉलिसी से लेकर शोध कार्यों और प्रशासनिक फाइलों के मूवमेंट तक, सब कुछ इसी क्लर्क के इशारे पर तय होता है। 30 साल की इस लंबी अवधि में इकबाल अहमद सिद्दीकी ने विभाग के भीतर अपना एक ऐसा सिंडिकेट (गठजोड़) तैयार कर लिया है, जो पर्दे के पीछे से सरकार के फैसलों को प्रभावित करता है। मुख्यमंत्री जहां पारदर्शिता की बात करते हैं, वहीं यूनानी विभाग का यह बाबू पूरी व्यवस्था पर हावी होकर सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है।

शोध के नाम पर ‘लूट’ और करोड़ों की परियोजनाएं ठप
इस क्लर्क और विभागीय अफसरों की मिलीभगत का नतीजा है कि यूनानी विभाग में शोध परियोजनाओं की आड़ में करीब 11 लाख 65 हजार रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता और ‘लूट’ की साजिश का सनसनीखेज दावा सामने आया है। इसके अलावा, बरेली में करोड़ों रुपये की लागत से बनकर तैयार हुआ राजकीय यूनानी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल आज विभागीय विफलता और इस सिंडिकेट की मनमानी के कारण दम तोड़ रहा है। खुद मुख्यमंत्री स्तर से इसका लोकार्पण होने के बावजूद इस अस्पताल में ओपीडी और स्वास्थ्य सेवाएं जानबूझकर शुरू नहीं होने दी गईं, जिससे आज इस करोड़ों की सरकारी संपत्ति के अस्तित्व पर ही संकट मंडरा रहा है।


