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महंगाई का तूफान सामने, RBI ने फिर टाला फैसला

विकास के दावों पर सवाल, अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहा मंदी और महंगाई का डबल खतरा

महंगाई और अल-नीनो के विलेन पर गवर्नर की पैनी नज़र, ‘न्यूट्रल’ गियर में रहकर दुश्मनों को पछाड़ेंगे शक्तिकांत

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस

देश की जनता पहले से ही बढ़ती महंगाई, महंगे पेट्रोल-डीजल और रोजमर्रा की वस्तुओं के बढ़ते दामों से परेशान है, लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नई मौद्रिक नीति ने आम लोगों को कोई राहत नहीं दी। RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखने का फैसला किया है। हालांकि केंद्रीय बैंक ने इसे “संतुलित और सतर्क” कदम बताया है, लेकिन आर्थिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला सरकार और RBI दोनों की बढ़ती चिंताओं को उजागर करता है।

RBI गवर्नर ने खुद स्वीकार किया कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव, सप्लाई चेन में व्यवधान और ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को अस्थिर बना दिया है। इसका सीधा असर भारत पर भी पड़ रहा है। RBI ने साफ संकेत दिया है कि आने वाले महीनों में महंगाई और बढ़ सकती है, जबकि आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ने का खतरा भी बना हुआ है।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए महंगाई दर 5.1 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है, जबकि तीसरी तिमाही में यह 5.9 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यानी आम आदमी की जेब पर दबाव और बढ़ने वाला है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी और कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय दामों में उछाल ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि आने वाले दिनों में रसोई गैस, परिवहन और खाद्य पदार्थ महंगे हो सकते हैं।

RBI की रिपोर्ट यह भी बताती है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है और एल-नीनो का खतरा भी मंडरा रहा है। यदि ऐसा हुआ तो कृषि उत्पादन प्रभावित होगा, खाद्यान्न कीमतें बढ़ेंगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ेगा। इससे महंगाई का नया चक्र शुरू होने की आशंका जताई जा रही है।

विकास दर के मोर्चे पर भी तस्वीर उतनी चमकदार नहीं दिख रही। RBI ने 2026-27 के लिए GDP वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, जो पिछले वर्ष के 7.6 प्रतिशत से कम है। यानी विकास की रफ्तार में गिरावट का संकेत खुद केंद्रीय बैंक दे रहा है। बढ़ती लागत, महंगा आयात और वैश्विक अनिश्चितता निवेशकों का भरोसा कमजोर कर सकती है।

चौंकाने वाली बात यह भी है कि विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं। RBI के आंकड़ों के मुताबिक जून 2026 तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) से 13.7 अरब डॉलर की निकासी हो चुकी है। इससे साफ है कि वैश्विक निवेशकों के बीच भारतीय बाजार को लेकर आशंकाएं बढ़ रही हैं।

हालांकि RBI विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए नए कदमों की घोषणा कर रहा है, लेकिन सवाल यह है कि यदि अर्थव्यवस्था वास्तव में इतनी मजबूत है तो फिर विदेशी निवेशकों को लुभाने के लिए इतनी अतिरिक्त रियायतों की जरूरत क्यों पड़ रही है?

बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं दिखती। रिपोर्ट के अनुसार बैंकों का मुनाफा पिछले वर्ष की तुलना में कम हुआ है। यानी वित्तीय संस्थानों पर भी दबाव बढ़ रहा है।

कुल मिलाकर RBI की यह नीति राहत से ज्यादा चिंता का संदेश देती है। महंगाई बढ़ने का खतरा, विकास दर में गिरावट, विदेशी निवेश की निकासी और कमजोर मानसून की आशंका—ये सभी संकेत बताते हैं कि आने वाले महीनों में आम जनता और कारोबारियों दोनों के लिए आर्थिक चुनौतियां बढ़ सकती हैं। सरकार भले ही विकास और स्थिरता के दावे कर रही हो, लेकिन RBI की रिपोर्ट के भीतर छिपी चेतावनियां एक अलग ही कहानी बयां कर रही हैं।

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