फ्लेक्स-फ्यूल के हवाई दावों के बीच फंसा मध्यम वर्ग
फ्लेक्स-फ्यूल के हवाई दावों के बीच फंसा मध्यम वर्ग: ईंधन की कीमतों पर 'झूठे दिलासे' और अधूरी बुनियादी संरचना

किसानों की समृद्धि के नाम पर केवल आंकड़ों की बाज़ीगरी; क्या ज़मीन पर पेट्रोल-डीजल के संकट को छुपा रही है सरकार?
निश्चय टाइम्स स्पेशल डेस्क, नई दिल्ली (4 जून 2026): राजधानी नई दिल्ली में आज पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी और सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने मारुति सुजुकी के ‘फ्लेक्स-फ्यूल यात्री वाहन’ को हरी झंडी दिखाकर इसे ‘आत्मनिर्भर भारत’ का नया अध्याय घोषित कर दिया। लेकिन सरकारी विज्ञापनों और मंत्रियों के जोशीले भाषणों से अलग, यह लॉन्च देश के मध्यम वर्ग और वाहन मालिकों के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है। वैश्विक संकट के बावजूद भारत में ईंधन की कीमतें सबसे कम बढ़ने का दावा उस देश में किया जा रहा है, जहां टैक्स के बोझ तले पेट्रोल-डीजल पहले से ही आम आदमी की पहुंच से बाहर है।
ई85 का बुनियादी ढांचा गायब: क्या कबाड़ बन जाएंगे नए फ्लेक्स-फ्यूल वाहन?
सरकार ने बड़ी शान से घोषणा की है कि दिसंबर 2026 तक देश में केवल 500 और 2027 के अंत तक 5,000 आउटलेट खोले जाएंगे।
- उपभोक्ताओं के साथ धोखा: सवाल यह उठता है कि आज जो उपभोक्ता लाखों रुपये खर्च करके फ्लेक्स-फ्यूल कार खरीदेगा, वह ई85 (85% इथेनॉल मिश्रण) ईंधन ढूंढने कहां जाएगा? दिल्ली-एनसीआर और मुंबई के चुनिंदा कॉरिडोर के बाहर यह गाड़ियां केवल सामान्य महंगे पेट्रोल पर चलने को मजबूर होंगी, जिससे उपभोक्ताओं पर दोहरी मार पड़ेगी।
- इंजन की उम्र पर खतरा: ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च इथेनॉल मिश्रण (जैसे ई85) के कारण इंजनों में जंग लगने और उनके जल्दी खराब होने का खतरा रहता है। सरकार ने इस तकनीकी खामी और वाहनों के रखरखाव पर आने वाले अतिरिक्त खर्च पर पूरी तरह चुप्पी साध रखी है।
किसानों की आय के नाम पर आंकड़ों का मायाजाल और खाद्य सुरक्षा पर संकट
प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया गया है कि 50% वाहन फ्लेक्स-फ्यूल पर आने से किसानों को 12,403 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय होगी। लेकिन यह पूरी तरह भ्रामक है:
अनाज की बर्बादी और भुखमरी का डर: भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में जहां कुपोषण एक बड़ी चुनौती है, वहां इथेनॉल बनाने के लिए टूटे हुए अनाज, मक्का और गन्ने का बड़े पैमाने पर डाइवर्जन (व्युत्पन्न) खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है। गाड़ियों के लिए ईंधन बनाने के चक्कर में आने वाले समय में खाद्यान्न की कीमतें आसमान छू सकती हैं, जिसका खामियाजा सीधे गरीब जनता को भुगतना होगा।
नीति आयोग द्वारा इसे ‘शून्य-उत्सर्जन’ का सर्टिफिकेट देना भी एक बड़ा प्रशासनिक मजाक है, क्योंकि इथेनॉल उत्पादन की फैक्ट्रियों से निकलने वाला प्रदूषण और पानी की भारी खपत पर्यावरण को और अधिक नुकसान पहुंचा रही है। साफ है कि सरकार अपनी विफलताओं और तेल की आसमान छूती कीमतों से ध्यान भटकाने के लिए फ्लेक्स-फ्यूल का एक ऐसा झुनझुना बाजार में लाई है, जिसका जमीनी इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह शून्य है।


