वित्तीय सुरक्षा का जनाज़ा: बैंकों में सरेआम लूट और RBI की लाचारी

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा जारी ताज़ा नीतियां इस बात का पुख्ता सुबूत हैं कि देश का बैंकिंग ढांचा आम आदमी की जेब काटने का जरिया बन चुका है । सबसे गंभीर मामला बैंक काउंटरों पर हो रही ‘मिस-सेलिंग’ (गलत वित्तीय उत्पाद बेचना) का है । बैंक कर्मचारी अपने टारगेट पूरे करने के चक्कर में कम पढ़े-लिखे, सीधे-साधे ग्राहकों और वरिष्ठ नागरिकों को ऐसे म्यूचुअल फंड, बीमा पॉलिसियां और जोखिम भरे थर्ड-पार्टी प्रोडक्ट्स थमा रहे हैं, जो उनके किसी काम के नहीं हैं । खुद केंद्रीय बैंक ने माना है कि ग्राहकों के रिस्क प्रोफाइल को नजरअंदाज कर वित्तीय उत्पाद बेचे जा रहे हैं और इसके घातक परिणाम हो रहे हैं । अब जाकर कड़े नियम बनाने का झुनझुना थमाया जा रहा है, लेकिन तब तक लाखों जमाकर्ता अपनी गाढ़ी कमाई गंवा चुके हैं ।
रिकवरी के नाम पर गुंडागर्दी: कब रुकेगा आम जनता का उत्पीड़न?
लोन रिकवरी के नाम पर बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) द्वारा पाले गए रिकवरी एजेंटों की प्रताड़ना थमने का नाम नहीं ले रही है । मौजूदा समय में अलग-अलग वित्तीय संस्थाओं के लिए अलग-अलग ढीले-ढाले नियम हैं, जिनका फायदा उठाकर ये एजेंट कानून को ठेंगा दिखाते हैं । मानसिक रूप से परेशान करना, रात-बेरात फोन करना और सामाजिक रूप से बदनाम करना इन एजेंटों की रोजमर्रा की कार्यशैली बन चुकी है। आरबीआई अब नियमों को “एकीकृत और सुसंगत” (Harmonise) करने का दावा कर रहा है, लेकिन सच तो यह है कि नियामक की सुस्ती के कारण आज भी देश का आम नागरिक इन रिकवरी एजेंटों की गुंडागर्दी के आगे असहाय खड़ा है।
डिजिटल पेमेंट का मायाजाल: फ्रॉड का गढ़ बना ‘कैशलेस इंडिया’
देश में डिजिटल लेन-देन का दिखावा तो आसमान छू रहा है, लेकिन इसके पीछे साइबर अपराधियों का एक ऐसा खूंखार नेटवर्क खड़ा हो चुका है जिससे सुरक्षा देने में सरकार और बैंक पूरी तरह नाकाम रहे हैं । डिजिटल फ्रॉड इतने शातिर और तकनीकी रूप से उन्नत हो चुके हैं कि मासूम ग्राहक पलक झपकते ही कंगाल हो रहे हैं । आरबीआई अब ‘लैग्ड क्रेडिट’ (भुगतान में देरी) और बुजुर्गों के लिए अतिरिक्त ऑथेंटिकेशन जैसे सुरक्षा उपायों पर चर्चा करने जा रहा है । यह कदम खुद यह साबित करता है कि मौजूदा डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर सुरक्षा के मामले में कितना खोखला है। नए नियमों से फ्रॉड तो कितना रुकेगा यह वक्त बताएगा, लेकिन आम यूज़र के लिए डिजिटल लेन-देन और ज्यादा पेचीदा और सिरदर्द जरूर बन जाएगा।
रीयल एस्टेट का जुआ: बैंकों में जमा जनता के पैसे पर मंडराया खतरा
आर्थिक मोर्चे पर सबसे आत्मघाती कदम रीयल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (REITs) को कमर्शियल बैंकों द्वारा सीधे कर्ज देने की मंजूरी देना है । इतिहास गवाह है कि रीयल एस्टेट सेक्टर सबसे अस्थिर और जोखिम भरा रहा है, जिसके कारण पहले भी बैंकों का एनपीए (NPA) रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा था । इसी खतरे को देखते हुए बैंकों को शुरुआत में इन संस्थाओं को लोन देने से सख्ती से रोका गया था । लेकिन अब, बड़े कॉर्पोरेट्स को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों को शिथिल किया जा रहा है । यदि यह सेक्टर दोबारा डूबा, तो बैंकों में जमा आम जनता की गाढ़ी कमाई और जमा पूंजी सीधे तौर पर स्वाहा हो जाएगी।



