आंकड़ों की बाजीगरी के पीछे छिपी कड़वी सच्चाई; वित्त मंत्री सुरेश खन्ना के दावों से यूपी और देश की आर्थिक बदहाली उजागर
12 साल के सुशासन के दावों की खुली पोल: ₹12 लाख करोड़ का बजट घाटा, गिरता विदेशी निवेश और राष्ट्रीय औसत से पिछड़ी यूपी की आय

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क:
एक तरफ जहां सरकार की ओर से 12 साल की सेवा और सुशासन का जश्न मनाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश और देश की बदहाल आर्थिक स्थिति की कड़वी सच्चाई खुद सरकार के मंत्रियों के बयानों से सामने आ रही है। लखनऊ के नैमिषारण्य वीवीआईपी गेस्ट हाउस में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान यूपी के वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने सरकार की उपलब्धियों का बखान तो किया, लेकिन जब जमीनी आर्थिक मोर्चे पर तीखे सवाल पूछे गए, तो दावों की पूरी हवा निकल गई।
यूपी की प्रति व्यक्ति आय में भारी असमानता राज्य को ‘वन ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी’ बनाने के विज्ञापनों के बीच वित्त मंत्री को खुद यह स्वीकार करना पड़ा कि उत्तर प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय अभी भी राष्ट्रीय औसत के मुकाबले काफी कम है। इस नाकामी को छुपाने के लिए उन्होंने तर्क दिया कि पहले यह ₹54,000 थी जो अब ₹1,08,000 हो गई है। लेकिन हकीकत यह है कि देश के अन्य प्रगतिशील राज्यों के मुकाबले यूपी का आम नागरिक आज भी बेहद कम कमा रहा है, जिससे क्षेत्रीय असमानता साफ नजर आती है।
₹12 लाख करोड़ का घाटा और कर्ज के जाल पर गैर-जिम्मेदाराना दलील आर्थिक मंदी और बजटीय कुप्रबंधन को उजागर करते हुए जब वित्त मंत्री से पूछा गया कि चालू वित्तीय वर्ष में सरकार ₹12 लाख करोड़ का भारी-भरकम बजट घाटा झेल रही है और केवल कर्ज का ब्याज चुकाने में ही जनता की गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा जा रहा है, तो उन्होंने बेहद गैर-जिम्मेदाराना रुख अपनाते हुए कहा, “यह तो बहुत अच्छी बात है कि हम अपना ब्याज समय से चुका रहे हैं।” घाटे और कर्ज के इस भयावह चक्र को सफलता की तरह पेश करना सरकार की ढुलमुल और कमजोर आर्थिक नीतियों का सबसे बड़ा प्रमाण है।
FDI में 50% की भारी गिरावट और योजनाओं का अधूरा सच ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के शोर के बीच सच यह है कि देश में नेट फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) में 50% की भारी गिरावट दर्ज की गई है। इस मोर्चे पर यूपी की हिस्सेदारी बेहद निराशाजनक रही है। इसके अलावा, वित्त मंत्री ने जिन योजनाओं (जैसे मुद्रा लोन, स्किल डेवलपमेंट, और स्टार्टअप्स) का जिक्र किया, वे जमीन पर युवाओं को स्थाई रोजगार देने में नाकाम रही हैं। 2025 में बेरोजगारी दर 3.1% होने का दावा भी युवाओं के आक्रोश के आगे बेअसर दिख रहा है, क्योंकि पेपर लीक और संविदा नौकरियों के कारण युवा परेशान हैं।
किसान क्रेडिट कार्ड और फसल बीमा के दावों के बावजूद ग्रामीण इलाकों में खाद-बीज का संकट और कर्ज का बोझ जस का तस है। मुफ्त राशन (81.35 करोड़ लोगों को) देने के आंकड़े को सरकार भले ही उपलब्धि बताए, लेकिन यह इस बात का सबूत है कि देश की एक बहुत बड़ी आबादी आज भी आत्मनिर्भर नहीं हो पाई है और बुनियादी भोजन के लिए सरकारी इमदाद पर निर्भर है। एक्सप्रेस-वे और इंफ्रास्ट्रक्चर के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स दरअसल आम जनता पर टैक्स और टोल का भारी बोझ बढ़ा रहे हैं, जिससे मध्यम वर्ग बुरी तरह त्रस्त है।



