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फ्लू के बढ़ते मामलों के बीच यूपी अलर्ट: सरकार बोली—स्थिति नियंत्रण में

फिर अस्पतालों को क्यों दिए गए विशेष इंतजाम के निर्देश?

दवा, ऑक्सीजन, नेबुलाइजर और आइसोलेशन बेड का स्टॉक बढ़ाने के आदेश; नेपाल सीमा से लगे जिलों में विशेष निगरानी

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क

उत्तर प्रदेश में मौसमी फ्लू के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। एक ओर सरकार प्रदेशवासियों को यह भरोसा दिला रही है कि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है और घबराने की जरूरत नहीं, वहीं दूसरी ओर अस्पतालों को दवा, ऑक्सीजन, नेबुलाइजर, ऑक्सीजन मास्क और गंभीर मरीजों के लिए अलग आइसोलेशन बेड तैयार रखने के निर्देश दिए गए हैं।

उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने शनिवार को स्वास्थ्य निदेशालय से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से प्रदेशभर के चिकित्साधिकारियों के साथ तैयारियों की समीक्षा की। अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि अस्पतालों में ओसेल्टामिविर (टैमीफ्लू) सहित जरूरी एंटीवायरल दवाओं और जीवनरक्षक संसाधनों की कमी किसी भी स्थिति में नहीं होनी चाहिए।

सबसे अहम बात यह रही कि जिन जिलों में फ्लू के मामले अधिक हैं, वहां सांस संबंधी शिकायत वाले मरीजों के लिए अलग ओपीडी चलाने के निर्देश दिए गए हैं। वहीं, जिला और संयुक्त अस्पताल स्तर पर गंभीर मरीजों के लिए चार से छह आइसोलेशन बेड तैयार रखने को कहा गया है।

सवाल यह भी उठता है कि यदि स्थिति पूरी तरह सामान्य और नियंत्रण में है, तो अलग ओपीडी, अलग रजिस्ट्रेशन काउंटर और आइसोलेशन बेड की जरूरत अचानक क्यों महसूस हुई? हालांकि स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि ये कदम किसी आपात स्थिति के कारण नहीं, बल्कि मरीजों को समय पर और बेहतर उपचार उपलब्ध कराने के लिए एहतियाती तौर पर उठाए जा रहे हैं।

डिप्टी सीएम ने लखनऊ के कैसरबाग स्थित HOPE सेंटर से प्रदेश के अस्पतालों की ऑनलाइन मॉनिटरिंग भी की। दवा, ऑक्सीजन और अन्य चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता की जानकारी लेते हुए किसी भी कमी को तत्काल दूर करने के निर्देश दिए गए।

नेपाल सीमा से लगे जिलों में विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश भी स्वास्थ्य विभाग की बढ़ी हुई चिंता को दर्शाते हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में फ्लू और बुखार के मामलों की लगातार निगरानी की जाएगी।

सरकार ने लोगों से घबराने के बजाय लक्षण दिखाई देने पर तुरंत अस्पताल पहुंचने की अपील की है। सवाल अब यही है कि आने वाले दिनों में फ्लू के मामलों पर नियंत्रण कितना प्रभावी रहता है और अस्पतालों की तैयारियां जमीनी स्तर पर कितनी मजबूत साबित होती हैं।

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