अंतरराष्ट्रीय

अमेरिका में सूखा, भारत में बारिश—क्या गेहूं निर्यात फैसला बनेगा महंगाई का ट्रिगर?

वैश्विक संकट के बीच निर्यात का दांव, कहीं घरेलू बाजार न हो जाए अस्थिर

(निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क)

अमेरिका में भीषण सूखे और भारत में हालिया बेमौसम बारिश के बीच गेहूं को लेकर वैश्विक और घरेलू स्थिति एक जटिल मोड़ पर पहुंच गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमतों में करीब 4.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो आपूर्ति संकट के संकेत देती है। वहीं भारत में बारिश के कारण फसल को नुकसान की आशंका जताई जा रही है, जिससे उत्पादन पर असर पड़ सकता है।

ऐसे समय में भारत सरकार द्वारा अतिरिक्त गेहूं निर्यात की अनुमति देना एक बड़ा और विवादित कदम बनकर उभर रहा है। एक ओर यह फैसला वैश्विक बाजार में ऊंची कीमतों का लाभ उठाने का अवसर प्रदान करता है, वहीं दूसरी ओर यह घरेलू जरूरतों को महंगा करने का जोखिम भी पैदा करता है।

सरकार का तर्क है कि देश में पर्याप्त उत्पादन और भंडार उपलब्ध हैं, लेकिन जमीनी हालात और मौसम की अनिश्चितता इस दावे को चुनौती देते हैं। यदि बेमौसम बारिश के कारण उत्पादन में उल्लेखनीय गिरावट आती है, तो निर्यात जारी रखना घरेलू आपूर्ति पर दबाव डाल सकता है। इससे खुले बाजार में गेहूं और आटा दोनों की कीमतों में तेजी आ सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक कीमतों में वृद्धि के लालच में जल्दबाजी में लिया गया निर्णय आगे चलकर उल्टा पड़ सकता है। खासकर तब, जब उत्पादन के आंकड़े पूरी तरह स्पष्ट न हों। यदि वास्तविक उत्पादन अनुमान से कम निकलता है, तो सरकार को निर्यात पर रोक लगाने या आयात करने जैसे कठोर कदम उठाने पड़ सकते हैं।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह नीति किसानों को लाभ पहुंचाएगी या फिर बिचौलियों और निर्यातकों को? अक्सर देखा गया है कि वैश्विक कीमतों का सीधा लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाता, जबकि महंगाई का बोझ आम उपभोक्ता पर जरूर पड़ता है।

इसके अलावा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और अन्य योजनाओं के लिए भी गेहूं की स्थिर उपलब्धता जरूरी है। यदि निर्यात के चलते भंडार घटता है, तो इन योजनाओं पर भी असर पड़ सकता है, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग पर अतिरिक्त दबाव बनेगा।


Related Articles

Back to top button