पर्यटन

एक पैर, लेकिन हौसला पूरा

मेजर ए.के. सिंह ने नाव से रचा समुद्री इतिहास, 15 माह में 50 हजार किलोमीटर का विश्व भ्रमण

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क |

हौसले के आगे अपंगता हारी

लखनऊ। एक पैर गंवाने के बावजूद अपने सपने को टूटने नहीं देने वाले सेवानिवृत्त मेजर ए.के. सिंह ने साहस, संकल्प और अदम्य इच्छाशक्ति की ऐसी मिसाल पेश की, जो आज भी प्रेरणा देती है। उन्होंने नाव से दुनिया की परिक्रमा करते हुए करीब 50 हजार किलोमीटर की समुद्री यात्रा पूरी की और अपने असाधारण अभियान को इतिहास के पन्नों में दर्ज कराया।

15 माह का रोमांच

मेजर सिंह ने 1985 से 1987 के बीच लगभग साढ़े 15 महीने तक समुद्र की चुनौतियों का सामना करते हुए विश्व भ्रमण किया। इस दौरान उन्होंने भूमध्य सागर और लाल सागर जैसे कठिन समुद्री मार्गों को पार किया। तूफानों और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उनका अभियान रुका नहीं।

सपना 1978 में देखा

मेजर ए.के. सिंह ने बताया कि विश्व भ्रमण की योजना उन्होंने वर्ष 1978 में बनाई थी। उस समय आर्थिक संसाधनों और आवश्यक उपकरणों का अभाव बड़ी बाधा था, लेकिन सपना कायम रहा। इसी बीच हैंग ग्लाइडिंग के एक हादसे में उनका बायां पैर कट गया। हादसे ने उनकी शारीरिक क्षमता को जरूर प्रभावित किया, लेकिन उनके इरादे को नहीं।

पुरानी नाव बनी साथी

अभियान को साकार करने के लिए इंग्लैंड से करीब साढ़े छह लाख रुपये में एक पुरानी नाव खरीदी गई। इसी नाव को आधार बनाकर उन्होंने समुद्री यात्रा की तैयारी की। मुंबई से अभियान शुरू हुआ और छह सदस्यीय टीम ने समुद्र की अनिश्चित परिस्थितियों के बीच यात्रा जारी रखी।

तूफानों से टकराया जुनून

समुद्र में मौसम की विकट परिस्थितियां और तूफान लगातार चुनौती बने रहे। इसके बावजूद टीम ने साहस नहीं खोया। हजारों किलोमीटर की इस यात्रा ने साबित किया कि कठिनाइयां किसी लक्ष्य का अंत नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प की परीक्षा होती हैं।

लखनऊ में साझा हुआ अनुभव

क्लब ऑफ लखनऊ की ओर से शनिवार को गोमतीनगर स्थित एक होटल में ‘ए ट्रैवलॉग: अराउंड द वर्ल्ड सेलिंग इन ए बोट’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। यहां मेजर ए.के. सिंह ने अपने रोमांचक समुद्री सफर की यादें और अनुभव साझा किए।

प्रेरणा का संदेश

कार्यक्रम में क्लब ऑफ लखनऊ के अध्यक्ष मनोज कुमार सिंह, पूर्व मुख्य सचिव अनूप चंद्र पांडेय और सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति विष्णु सहाय सहित अनेक गणमान्य लोग मौजूद रहे। मेजर सिंह की कहानी ने यह संदेश दिया कि शारीरिक सीमाएं लक्ष्य की राह नहीं रोक सकतीं, यदि संकल्प मजबूत हो।

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