राष्ट्रीय

वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के बीच डॉलर जुटाने की हताशा:

वित्त मंत्री की आपात बैठक में बैंकों को एनआरआई (NRI) फंड के लिए झोंकने के निर्देश

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क

वैश्विक बाजारों में बढ़ती अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और विदेशी पूंजी के लगातार बाहर जाने (Capital Outflow) के खतरों के बीच भारत के बाह्य वित्तीय मोर्चे पर दबाव साफ दिखने लगा है। नई दिल्ली में केंद्रीय वित्त एवं कॉर्पोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) और सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों (PFIs) के शीर्ष प्रबंध निदेशकों (MDs) और मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (CEOs) की एक आपात समीक्षा बैठक बुलाई। बैठक का मुख्य एजेंडा भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की विदेशी मुद्रा स्वैप पहलों—एफसीएनआर(बी), ईसीबी और ओएफसीबी—के जरिए एनआरआई (NRI) जमाओं को युद्धस्तर पर आकर्षित करना था, जो यह दर्शाता है कि सरकार किसी भी स्थिति में देश के विदेशी मुद्रा भंडार को ढहने से बचाने के लिए अत्यधिक चिंतित है।

ब्याज दरों की सीमा हटाने पर भी विदेशी फंड जुटाने की गति धीमी, बैंकों को दिए कड़े निर्देश समीक्षा बैठक के दौरान यह तथ्य खुलकर सामने आया कि आरबीआई द्वारा नई एफसीएनआर(बी) जमाओं पर ब्याज दरों की अधिकतम सीमा (Interest Rate Cap) को सस्पेंड करने के बाद भी बैंकों को फंड जुटाने में भारी मशक्कत करनी पड़ रही है। हालांकि बैंकों ने सिंगापुर, हांगकांग, पश्चिम एशिया, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे क्षेत्रों से अनिवासी भारतीयों (NRIs) द्वारा रुचि दिखाए जाने की बात कही, लेकिन वित्त मंत्री इन प्रारंभिक आंकड़ों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिखीं। उन्होंने कड़े शब्दों में बैंकों को अपनी संपर्क रणनीतियों में बदलाव करने, डिजिटल चैनलों को आक्रामक रूप से एक्टिव करने और अभिनव (Innovative) जमा उत्पाद पेश करने का निर्देश दिया। वित्त मंत्री की यह सख्ती साफ संकेत देती है कि चालू वित्त वर्ष की शेष अवधि में यदि जमा राशि जुटाने की गति धीमी रही, तो भुगतान संतुलन (Balance of Payments) पर इसका प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही पर टिकी पूरी उम्मीद, बाह्य वाणिज्यिक उधार (ECB) में अनिश्चितता बरकरार बैठक में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निदेशकों ने दावा किया कि वे चालू वित्त वर्ष 2026-27 की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर 2026) के दौरान बाह्य वाणिज्यिक उधार (ECB) के माध्यम से धन जुटाने की प्रक्रिया में तेजी लाएंगे। हालांकि, आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर बढ़ती ब्याज दरों के कारण विदेशी बाजारों से महंगा कर्ज (ECB) उठाना भारतीय बैंकों के लिए एक बड़ी वित्तीय देनदारी और जोखिम साबित हो सकता है। यह चिंता तब और गहरी हो जाती है जब आरबीआई गवर्नर की 5 जून, 2026 की मौद्रिक नीति में घोषित डॉलर-रुपये स्वैप सुविधाओं की रियायती दरों के बावजूद, बैंकों को विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए निवेशकों को अत्यधिक आकर्षक और महंगे रिटर्न देने पड़ रहे हैं।

गिफ्ट सिटी के आईबीयू (IBU) का सीमित उपयोग और समय सीमा का बढ़ता दबाव चर्चा में यह बात भी रेखांकित हुई कि गुजरात के गिफ्ट सिटी स्थित अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (IFSC) में स्थापित अंतर्राष्ट्रीय बैंकिंग इकाइयों (IBUs) का उपयोग अभी तक कुछ ही चुनिंदा देशों से धन जुटाने के लिए किया जा सका है। वित्त मंत्री ने इस संस्थागत बुनियादी ढांचे के बेहद सुस्त और सीमित उपयोग पर असंतोष जताते हुए इसका अधिकतम लाभ उठाने का आग्रह किया। सबसे बड़ा दबाव समय सीमा (Deadlines) का है; एफसीएनआर(बी) जमा राशि जुटाने के लिए केवल 30 सितंबर, 2026 तक का समय शेष है, जबकि ईसीबी और ओएफसीबी की रियायती योजनाएं 31 दिसंबर, 2026 को समाप्त हो रही हैं। समय बीतने के साथ-साथ बैंकों पर इस शॉर्ट-टर्म लिक्विडिटी को हासिल करने का दबाव चरम पर पहुंच गया है, जो वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत की बाह्य क्षेत्र की मजबूती को बनाए रखने की हताशा को प्रकट करता है।

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