सोया प्रोटीन में आत्मनिर्भर भारत की बड़ी छलांग

पौध-आधारित पोषण में भारत का वैश्विक दांव
आयात घटेगा, निर्यात बढ़ेगा, किसानों को मिलेगा अधिक मूल्य
स्वदेशी तकनीक से बनेगा विश्वस्तरीय सोया प्रोटीन हब
निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क
भारत ने पौध-आधारित पोषण और मूल्यवर्धित खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (TDB) ने इंदौर स्थित सोनिक बायोकेम एक्सट्रैक्शन्स प्राइवेट लिमिटेड को स्वदेशी फंक्शनल सोया प्रोटीन कंसंट्रेट (FSPC) और टेक्सचर्ड सोया प्रोटीन कंसंट्रेट (TSPC) के व्यावसायिक उत्पादन के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की है।
यह परियोजना अत्याधुनिक विनिर्माण सुविधा स्थापित कर पूरी तरह स्वदेशी तकनीक के माध्यम से उच्च गुणवत्ता वाले, नॉन-जीएमओ पौध-आधारित प्रोटीन उत्पादों का उत्पादन करेगी। इनका उपयोग प्रोसेस्ड फूड, प्लांट-बेस्ड मीट, न्यूट्रिशन सप्लीमेंट्स और हेल्थ फूड्स में व्यापक स्तर पर किया जाएगा।
विशेष बात यह है कि कंपनी ने पारंपरिक और महंगे सोया प्रोटीन आइसोलेट (SPI) पर निर्भर रहने के बजाय भारत में विकसित सोया प्रोटीन कंसंट्रेट (SPC) आधारित तकनीक विकसित की है। इससे उत्पादन लागत में उल्लेखनीय कमी आएगी, विदेशी आयात पर निर्भरता घटेगी और भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे।
टीडीबी सचिव राजेश कुमार पाठक ने कहा कि यह पहल केवल खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को नई दिशा नहीं देगी, बल्कि आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को भी मजबूती प्रदान करेगी। उन्होंने कहा कि स्वदेशी तकनीकों को बढ़ावा देकर भारत मूल्यवर्धित कृषि उत्पादों के वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत पहचान स्थापित कर सकता है।
दो दशक से अधिक समय से गैर-जीएमओ सोया उत्पादों के निर्माण और निर्यात में सक्रिय सोनिक बायोकेम का मानना है कि यह सहयोग कंपनी को अपनी स्वदेशी तकनीक का बड़े पैमाने पर व्यावसायीकरण करने, निर्यात बढ़ाने और वैश्विक पौध-आधारित पोषण बाजार में भारत की भागीदारी मजबूत करने में मदद करेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार यह परियोजना केवल उद्योग तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि किसानों को बेहतर मूल्य, खाद्य उद्योग को सस्ती उच्च गुणवत्ता वाली कच्ची सामग्री और देश को विदेशी मुद्रा की बचत का भी बड़ा लाभ देगी। यह पहल भारत को टिकाऊ, नवाचार-आधारित और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी खाद्य अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर करने वाला महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकती है।



