महंगाई का खेल या नीतिगत नाकामी?
पहले रिकॉर्ड निर्यात से तिजोरियां भरीं, अब आसमान छूते दामों पर जनता की जेब पर डाका

निश्चय टाइम्स न्यूज़ डेस्क
त्योहारी सीजन से ठीक पहले प्याज की बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है। सरकार भले ही ₹35 प्रति किलो प्याज बेचने और ‘कंदा एक्सप्रेस’ जैसी लॉजिस्टिक वाहवाही के दावे कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। सवाल यह उठता है कि जब सरकार को पहले से ही आने वाले महीनों में मांग बढ़ने और कीमतों में उछाल की पूरी जानकारी थी, तो फिर देश का बंपर प्याज पानी के भाव पानी की तरह विदेशों में क्यों बहा दिया गया?
पहले निर्यात की खुली छूट, अब आयात का ढोंग
जानकारों और आम जनता का सवाल है कि शुरुआती महीनों में अंधाधुंध निर्यात की अनुमति देकर बिचौलियों, स्टॉकिस्टों और मुनाफाखोरों ने तो अपनी तिजोरियां भर लीं, और अब आम जनता को राहत देने के नाम पर कागजी और सीमित हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। जब देश में प्याज का पर्याप्त उत्पादन (307.37 लाख मीट्रिक टन) हुआ था, तब सुनियोजित कुप्रबंधन के चलते घरेलू बाजार में किकृम पैदा कर दी गई।
अब जब कीमतें आम आदमी की पहुंच से बाहर हो रही हैं, तो सरकार बफर स्टॉक से छुटपुट माल निकालकर अपनी पीठ थपथपा रही है। क्या यह नीतिगत विफलता है या फिर बिचौलियों को फायदा पहुंचाने का कोई सुनियोजित खेल? उपभोक्ता मामलों के विभाग की रोजाना की निगरानी और 579 केंद्रों के आंकड़े भी इस बात की गवाही दे रहे हैं कि जनता केवल खोखले आश्वासनों के सहारे जीने को मजबूर है। जब तक कालाबाजारी और बिचौलियों के गठजोड़ पर कड़ा प्रहार नहीं होगा, तब तक कागजी दावे आम आदमी की आंसू भरी आंखों को नहीं पोंछ सकते।



