राष्ट्रीय

खाकी के साये में गहराता सन्नाटा

क्या जवानों की जिंदगियों की कीमत चुकानी भूल गया तंत्र?

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क

सुरक्षा के चक्रव्यूह को हर रोज अपनी छाती पर झेलने वाले देश के प्रहरी आज खुद अपने ही बुने हुए मानसिक तनाव के जाल में घुट-घुटकर दम तोड़ने को मजबूर हैं। देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल यानी सीआरपीएफ के भीतर से आ रही खबरें किसी भयानक सुनामी से कम नहीं हैं। ताजा सरकारी और मीडिया आंकड़ों के झकझोर देने वाले खुलासे ने देश के माथे पर गहरी चिंता की लकीरें खींच दी हैं। साल 2026 के शुरुआती पांच महीनों (मई के अंत तक) में ही बल के 19 जवानों ने आत्महत्या जैसे खौफनाक कदम उठाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली है। यह महज़ आंकड़े नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक और मानवीय व्यवस्था की पोल खोलती चीखें हैं जो इन रक्षकों की मानसिक सुरक्षा तय करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है।

स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले पांच सालों (2021 से 2025) में कुल 281 जवानों ने आत्महत्या की है, जिसमें से लगभग 216 जवान अपनी ड्यूटी के दौरान ही इस चरम कदम को उठाने पर विवश हुए। साल दर साल यह ग्राफ लगातार डरावना होता गया है—जहां 2021 में 57, 2022 में 43, 2023 में 57, और 2024 में 46 मौतें दर्ज हुईं, वहीं 2025 का साल सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए 59 आत्महत्याओं के साथ सबसे काला और खौफनाक अध्याय साबित हुआ।

जब देश की रक्षा करने वाले सिपाही ही अपनी जिंदगी की जंग हार जाएं, तो यह राष्ट्र के लिए आत्ममंथन का सबसे गंभीर पल है। इस अत्यंत संवेदनशील और दिल दहला देने वाले मामले पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने आखिरकार स्वतः संज्ञान लेते हुए कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने केंद्रीय गृह सचिव और सीआरपीएफ के महानिदेशक को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर एक विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। क्या हमारे जवानों की जिंदगी केवल कागजी आंकड़ों और सरकारी फाइलों तक सीमित रह गई है? आखिर कब तक वर्दी के भीतर पलने वाला यह खामोश दर्द और मानसिक घुटन यूं ही हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ती रहेगी? यह वक्त सिर्फ नोटिस देने का नहीं, बल्कि व्यवस्था की उन खामियों को चीरकर बाहर निकालने का है, जो हमारे वीरों को मौत को गले लगाने के लिए मजबूर कर रही हैं।

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