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विदेशी कर्ज़ के सहारे बढ़ती अर्थव्यवस्था या बढ़ता वित्तीय जोखिम?

मार्च 2026 में ECB/FCCB उधारी का विस्फोट, क्या भारतीय कंपनियां कर्ज़ के जाल में फंस रही हैं?

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क

नई दिल्ली: भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जारी मार्च 2026 के ECB/FCCB आंकड़ों ने देश की कॉरपोरेट और वित्तीय व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आंकड़ों के अनुसार दर्जनों भारतीय कंपनियों और वित्तीय संस्थानों ने अरबों डॉलर के विदेशी कर्ज़ लिए, जिनमें बड़ी संख्या में NBFC, फाइनेंस कंपनियां और निजी कॉरपोरेट समूह शामिल हैं। आलोचकों का कहना है कि देश की अर्थव्यवस्था अब घरेलू मजबूती से अधिक विदेशी उधारी पर निर्भर होती दिखाई दे रही है।

विशेष चिंता की बात यह है कि बड़ी मात्रा में लिए गए कर्ज़ “ऑन-लेंडिंग”, “वर्किंग कैपिटल” और पुराने कर्ज़ चुकाने यानी “रीफाइनेंसिंग” के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं। इससे संकेत मिलता है कि कई कंपनियां नए निवेश के बजाय पुराने वित्तीय दबावों को संभालने के लिए विदेशी धन का सहारा ले रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक ब्याज दरें बढ़ीं या डॉलर मजबूत हुआ, तो भारतीय कंपनियों पर भारी दबाव पड़ सकता है।

RBI डेटा में Bajaj Finance, IIFL Finance, Aditya Birla Capital, REC, NABARD और कई अन्य संस्थानों द्वारा भारी विदेशी उधारी दर्ज की गई। विपक्षी आर्थिक विश्लेषकों का आरोप है कि सरकार “मेक इन इंडिया” और आत्मनिर्भरता का दावा करती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में कंपनियां विदेशी पूंजी पर पहले से ज्यादा निर्भर हो रही हैं।

कई मामलों में विदेशी इक्विटी होल्डर्स से लिए गए लंबे समय के कर्ज़ ने यह आशंका भी बढ़ाई है कि भारतीय उद्योगों पर विदेशी प्रभाव और नियंत्रण लगातार बढ़ सकता है। दूसरी ओर, आम जनता महंगाई, रोजगार संकट और आर्थिक अनिश्चितता से जूझ रही है, जबकि बड़ी कंपनियां विदेशी वित्तीय नेटवर्क से लगातार लाभ उठा रही हैं।

आर्थिक जानकारों का कहना है कि यदि इस तरह की विदेशी उधारी पर मजबूत निगरानी नहीं रखी गई, तो भविष्य में यह वित्तीय स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या भारत की विकास दर वास्तव में मजबूत है, या फिर विदेशी कर्ज़ के सहारे कृत्रिम रूप से चमकाई जा रही है।

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