4,700 करोड़ का एक्सप्रेसवे सवालों के घेरे में
स्लिपेज ने खोली गुणवत्ता की परतें, एनएचएआई का बड़ा एक्शन

टोल बंद, चार्जशीट की तैयारी, निर्माण कंपनी पर गिरी कार्रवाई की गाज
निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क ।
करोड़ों रुपये की लागत से निर्मित कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे एक बार फिर निर्माण गुणवत्ता और जवाबदेही को लेकर गंभीर सवालों के केंद्र में आ गया है। किमी-64 के पास सड़क धंसने (स्लिपेज) की घटना के बाद भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने अभूतपूर्व कार्रवाई करते हुए वर्तमान और पूर्व परियोजना निदेशकों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी है। इसके साथ ही मरम्मत पूरी होने तक एक्सप्रेसवे पर टोल वसूली तत्काल प्रभाव से रोक दी गई है।
लापरवाही पर गिरी कार्रवाई की गाज
एनएचएआई ने वर्तमान परियोजना निदेशक नकुल प्रकाश वर्मा को उनके मूल विभाग में वापस भेज दिया है, जबकि पूर्व परियोजना निदेशक सौरभ चौरसिया और वर्तमान परियोजना निदेशक के खिलाफ चार्जशीट जारी करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। यह कार्रवाई परियोजना की निगरानी में कथित लापरवाही के आरोपों के आधार पर की जा रही है।
निर्माण कंपनी पर भी कड़ा शिकंजा
निर्माण एजेंसी पीएनसी इंफ्राटेक लिमिटेड को नॉन-परफॉर्मर नोटिस जारी किया गया है। कंपनी से लगभग 3 करोड़ रुपये की लागत से प्रभावित हिस्से की मरम्मत उसके स्वयं के खर्च पर कराई जाएगी। साथ ही निष्पादन सुरक्षा राशि पर दंड, रेटिंग डाउनग्रेड और भविष्य की परियोजनाओं में कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।
आईआईटी खड़गपुर करेगा तकनीकी पोस्टमार्टम
घटना के वास्तविक कारणों का पता लगाने के लिए आईआईटी खड़गपुर के प्रो. के. एस. रेड्डी के नेतृत्व में विशेषज्ञ समिति गठित की गई है। टीम सड़क धंसने के मूल कारणों की जांच कर भविष्य के लिए तकनीकी सुझाव भी देगी। वहीं पूरे एक्सप्रेसवे की गुणवत्ता का परीक्षण लेजर प्रोफिलोमीटर तकनीक से कराया जाएगा।
तीन अधिकारियों पर दो साल की रोक
निर्माण एजेंसी के प्रोजेक्ट मैनेजर, स्वतंत्र अभियंता के टीम लीडर और रेजिडेंट इंजीनियर को परियोजना से हटाकर दो वर्षों तक एनएचएआई, मोर्थ और एनएचआईडीसीएल की परियोजनाओं में भाग लेने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। स्वतंत्र अभियंता संस्था के खिलाफ भी प्रतिबंध की कार्रवाई प्रस्तावित है।
टोल बंद, स्पीड लिमिट बरकरार
एनएचएआई ने स्पष्ट किया कि 120 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड लिमिट में कोई बदलाव नहीं किया गया है। मरम्मत पूरी होने तक यात्रियों से टोल नहीं लिया जाएगा और राजस्व की भरपाई रियायतग्राही कंपनी से की जाएगी।
यह घटनाक्रम स्पष्ट संकेत देता है कि सार्वजनिक परियोजनाओं में गुणवत्ता से समझौता अब भारी पड़ सकता है और जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया और अधिक सख्त होती जा रही है।



